अतीत को जाने: जब Greta Andersen को डूबने से बचाना पड़ा

डेनमार्क की तैराक Greta Andersen एक पूल में आराम करती हुई। (Derek Berwin/Fox Photos/गेटी इमेज द्वारा फोटो)
डेनमार्क की तैराक Greta Andersen एक पूल में आराम करती हुई। (Derek Berwin/Fox Photos/गेटी इमेज द्वारा फोटो)

ओलंपिक खेलों के फाइनल मुकाबले रोमांचक, भावुक और बेहद खूबसूरत होते हैं। हर सप्ताह हम बीते ओलंपिक खेलों के फाइनल्स मे देखे गए अद्भुत लम्हों को फिर से याद करते हैं और इस बार हम आपको बताएंगे की कैसे तैराक Greta Anderson ओलंपिक खेलों में डूबते डूबते बची थी।

पहले की कहानी

आज से कुछ 93 साल पहले डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में ओलंपिक खेलों के इतिहास में सबसे तेज़ चमकने वाले सितारों में से एक ने जन्म लिया था, और उनका नाम है Greta Anderson. जब डेनमार्क पर नाज़ी जर्मनी का कब्ज़ा था तब Anderson ने 16 साल की उम्र में तैराकी शुरुआत की थी। उस समय Anderson को न केवल तैराकी बल्कि जिम्नास्टिक्स में भी रूचि थी।   

तैराकी Greta Andersen का जुनून बनता गया और उन्होंने 1947 में अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लिया और यूरोपियन चैंपियनशिप में 2 पदक पदक जीते, जिसमे एक 4x100 मी फ्रीस्टाइल स्वर्ण और 100 मी रजत शामिल था। इसी वजह से लंदन ओलंपिक खेलों के पहले ही उनके बारे में चर्चा शुरू हो गयी थी।

फाइनल मुकाबला

बेहद उम्मीदों और दबाव के बीच 1948 के लंदन ओलंपिक खेलों में Anderson ने हिस्सा लिया और किसी की परवाह न करते हुए, उन्होंने 100 मी फ्रीस्टाइल में स्वर्ण और 4x400 मी फ्रीस्टाइल रीले में रजत पदक जीत लिया।

दो शानदार पदक जीतने के बाद, Anderson का आत्मविश्वास बढ़ गया था और 400 मी की तीसरी हीट्स के पहले उन्हें जीत की उम्मीद थी। 'मुझे 400 मी प्रतियोगिता से काफी उम्मीदें थी और मुझे ऐसा लगा था की जैसे कोई मुझे हरा नहीं पाएगा,' Anderson ने वह समय याद करते हुए कहा।

लेकिन असल में जो हुआ वह Anderson की कल्पना और उम्मीदों के विपरीत था।

दुर्भाग्यवश, Anderson का मासिक चक्र भी उसी समय पड़ गया जब 400 मी की हीट्स थी और पराजय से बचने के लिए उन्होंने टीका लगा कर चक्र विलम्भित कर दिया।

'जब मैंने तैरना शुरू किया तो काफी अच्छा महसूस कर रही थी पर थोड़ी देर बाद मुझे ऐसे लगा की मेरी टांगें और पेट ने काम करना बंद कर दिया है। उसके बाद मैं बेहोश हो गयी और मुझे कुछ याद नहीं है।'

Anderson पानी में बेहोश हो गयी और वह डूब रही थी। किस्मत से बाकी खिलाडियों ने यह देखा और तुरंत पूल में कूद कर उन्हें बचा लिया।

कैसे एक ओलंपिक चैंपियन तैराक लंदन 1948 में लगभग डूब गईं थीं
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परिणाम

यह सब होने के बाद भी Anderson को एक महान तैराक बनने से कोई मानसिक बाधा नहीं रोक पायी। 

लंदन ओलिंपिक के ठीक दो साल बाद उन्होंने यूरोपियन चैंपियनशिप में हिस्सा लिया और तीन पदक जीते पर अगले हेलसिंकी ओलिंपिक में उनके हाथ सिर्फ निराशा ही लगी। Anderson ने तीन प्रतियोगिताओं में भाग लिया पर सर्जरी के कारण उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। 

हेलसिंकी खेलों के बाद, Anderson अमरीका चली गयी और वहां उन्होंने मैराथन तैराकी करी और सफल हो कर दिखाया। Anderson ने 1958 में वह कर दिखाया जो विश्व इतिहास में किसी तैराक ने नहीं किया था। उन्होंने 1958 में सैंटा काटलिना चैनल पार कर के दिखाया। 

1965 तक वह इंग्लिश चैनल 6 बार पार कर चुकी थी और यह करने वाली वह पहली महिला बनी थी। Andersen ने दोनों छोर से अंग्रेजी चैनल को सबसे तेज़ पार करने का भी रिकॉर्ड बनाया - फ्रांस से इंग्लैंड (11 घंटे, 1 मिनट) और इंग्लैंड से फ्रांस (13 घंटे, 10 मिनट) । संन्यास लेने के बाद भी Andersen ने तैराकी से संपर्क रखा और 1960 में उन्होंने Greta Andersen तैराकी स्कूल की स्थापना कैलिफ़ोर्निया में करी।

Andersen को अंतरराष्ट्रीय तैराकी हॉल ऑफ़ फेम में सन 1969 में शामिल किया गया और उन्होंने अपने करियर में कई पुरुषों को भी परास्त किया। 

"Andersen दुनिया की पहली महिला बनी जिन्होंने पुरुषों से मुकाबला किया और उनको हराया भी।'

"Greta Andersen इस दिलचस्प मुद्दे को उठाने वाली पहली व्यक्ति थी। अगर महिलाएं मैराथन तैराकी में पुरुषों से मुक़ाबला कर सकती हैं तो फिर वह लघु और मध्यम दूरी में क्यों नहीं कर सकती? Andersen ने तैराकी की दुनिया में सारे कीर्तिमान हासिल किए और 93 साल की उम्र में वह डेनमार्क की सबसे दिग्गज तैराक हैं। उन्हें हर बात का जवाब मिल चुका है पर यह नहीं पता की वह कौनसी दवा थी जिसकी वजह से 1948 लंदन खेलों में बेहोश हो गयी थी।'