Sanjeev Rajput के निशाने पर ओलंपिक स्वर्ण

भारत के Sanjeev Rajput का लक्ष्य अगले साल टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतना है। (Albert Perez/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)
भारत के Sanjeev Rajput का लक्ष्य अगले साल टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतना है। (Albert Perez/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)

भारत के निशानेबाज़ ने टोक्यो 2020 से खास बातचीत में अपने लक्ष्य के बारे में बताया 

वर्ष 2016 में भारतीय निशानेबाज़, Sanjeev Rajput ने अपने जीवन के सबसे बड़े सपने को पूरा करने की ठान ली थी, और रियो खेलों में पदक जीतने की तैयारी कर रहे थे।

ब्राज़ील में अपने जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य पाने की तैयारी कर रहे Sanjeev Rajput को यह नहीं पता था की उन्हें रियो खेलों में भाग लेने का अवसर ही नहीं मिलेगा और उनका स्थान किसी अन्य निशानेबाज़ को दे दिया जाएगा।

बेहद विवादास्पद परिस्थितियों में ओलंपिक पदक का सपना Rajput से छीन लिया गया और उनका खेल जीवन निराशा से भर गया।

उन्होंने बताया, 'मैं इतना दुखी था और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं।'

'मेरे सारे सपने मेरी आँखों के सामने मुझसे छीन लिए गए थे और मेरी उम्मीदों के विपरीत सब कुछ हो रहा था। मैं कुछ कर भी नहीं सका क्योंकि मेरे हाथ में कुछ नहीं था। अंतिम दिन तक मुझे लग रहा था की एक फ़ोन आएगा और मैं रियो चला जाऊंगा पर ऐसा नहीं हुआ।'

रियो में पक्का किया टोक्यो का स्थान 

हरियाणा के रहने वाले Rajput को प्रारंभ ने अपनी कुशलता का प्रमाण देने का दूसरा अवसर दिया और संजोग से टोक्यो 2020 में अपनी जगह बनाने के लिए उन्हें रियो में हो रहे विश्व कप में पदक जीतना था। अपने आलोचकों को करारा जवाब देते हुए Rajput ने 2019 विश्व कप में 50 मी राइफल तीन पोजीशन प्रतियोगिता में रजत जीत लिया।

Rajput की मानें तो यह कोई संजोग नहीं था, 'मुझे पहले से पता था की यह प्रतियोगिता रियो में आयोजित होगी और मेरे पास तैयारी करने का समय था।'

'रियो विश्व कप में रजत पदक जीतने के साथ मैंने दो लक्ष्य एक साथ हासिल कर लिए जिनमे से पहला था अपने आलोचकों को गलत साबित करना। कई लोगों ने 2016 में कहा था कि मेरे अंदर पदक जीतने की क्षमता नहीं है और यह मेरा उन सभी को जवाब था।'

'मेरा दूसरा लक्ष्य था की मैं टोक्यो 2020 खेलों की तैयारी के लिए टोक्यो के वातावरण को समझ पाऊं। रियो और टोक्यो में काफी समानताएं हैं जिसकी वजह से मेरे लिए उन परिस्थितियों के अनुकूल होना आसान होगा।'

निशानेबाज़ी कि लम्बी दौड़

हालांकि टोक्यो 2020 खेल Rajput के लिए ओलंपिक में भाग लेने का तीसरा मौका होगा, वह अपनी आयु और उसके साथ आने वाली चुनौतियों के बारे में सतर्क हैं। उन्होंने हर आने वाली कठिनाई के लिए तैयारी की है, चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक।

Abhinav Bindra, Gagan Narang और Manavjit Sandhu के साथ Rajput भारत के सबसे अनुभवी निशानेबाज़ों में से एक हैं लेकिन उनकी लोकप्रियता बाकी खिलाड़ियों के मुकाबले में कम है। उनके करीबी लोगों का यह मानना है कि Rajput का शर्मीला स्वाभाव और शांत रहने की आदत इसका सबसे बड़ा कारण है।

अगर आप उनसे पूछेंगे कि जीवन में उनका लक्ष्य क्या है, तो Rajput का उत्तर शायद आपको हैरान कर दे।

'मुझे ऐसा लगता है की ओलंपिक पदक जीतने के बाद ही विवाह करूं और जीवन की अन्य बातों के बारे में सोचूं।'

'इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण है की मुझे दुसरे इंसान का स्वभाव शायद न पता हो और अगर उनका पूरा सहयोग न मिले तो यह परेशानी की बात होगी। एक बार मैं ओलंपिक पदक जीत जाऊं तो बाकी चीज़ों के बारे में सोच सकता हूं।'

निशानेबाज़ी के बिना सबसे लम्बा समय

निशानेबाज़ी एक ऐसा खेल है जिसे चार वर्ष में एक बार पूरे राष्ट्र में लोकप्रियता मिलती है लेकिन हर निशानेबाज़ को निरंतर अभ्यास और प्रयास करना पड़ता है। राइफल से एक हफ्ता भी दूर रहना किसी खिलाड़ी के लिए बहुत कठिन होता है पर कोरोना महामारी के कारण Rajput चार माह तक अभ्यास नहीं कर पाए।

Rajput ने बताया, 'मुझे ऐसे लगा की मैं सब भूल चुका हूं और सब कुछ दोबारा से सीखना पड़ेगा क्योंकि मेरा शरीर तैयार नहीं था और मानसिक तौर से भी कठिनाई हो रही थी।'

'शुरुआत में मुझे पता नहीं था कि मेरा निशाना सही लग रहा था या नहीं और मुझे एक सप्ताह लगा अपनी शारीरिक स्थान ठीक करने में।'

निशानेबाज़ी एक ऐसा खेल है जिसके अंदर पदक विजेता और बाकी खिलाड़ियों में बहुत बारीक अंतर होता है जिसकी वजह से दर्शकों या विशेषज्ञों को कुछ बातें समझ नहीं आती हैं। Rajput का मानना है कि मानसिक संतुलन और शक्ति बहुत महत्वपूर्ण होती हैं एक खिलाड़ी के लिए और किसी भी बड़ी प्रतियोगिता के पहले वह एक ख़ास तरह की तैयारी करते हैं।

हमने Rajput से पूछा की निशाना लगते हुए एक निशानेबाज़ के दिमाग में क्या चल रहा होता है।

उन्होंने कहा, 'आप बहुत ज़्यादा नहीं सोच सकते क्योंकि वह आपकी हार का कारण बन जाएगा। जिस क्षण आपने आगे के स्कोर के बारे में सोचा और आगे की रणनीति बनाने का प्रयास किया सब ख़राब हो सकता है। इसी कारण से निशानेबाज़ी बहुत ही कठिन खेल होता है और ओलंपिक खेलों में यह कठिनाई बढ़ जाती है।'

टोक्यो 2020 खेलों में स्वर्ण का सपना 

भारत के खेल इतिहास में सिर्फ एक ही खिलाड़ी ने व्यक्तिगत स्वर्ण जीता है, और वह भी एक निशानेबाज़ थे।

Abhinav Bindra के स्वर्ण पदक के बाद से तीन ओलंपिक खेल हो चुके हैं और वह गिनती एक पर ही अटकी हुई है।

Rajput की आयु 39 है और बहुत से आलोचक उन्हें टोक्यो में पदक जीतने का दावेदार नहीं मानेंगे पर उनका लक्ष्य सिर्फ एक है।

'मैंने अपना लक्ष्य निर्धारित कर लिया है और वह है टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण जीतना। मुझे पता है यह कठिन होगा लेकिन मुझे विश्वास है की मैं कर सकता हूँ। इस समय स्थिति ऐसी है कि यूरोप के निशानेबाज़ों ने अभ्यास शुरू कर दिया है और कुछ तो प्रतियोगिता में भी भाग ले रहे हैं। खेल के स्तर में इस वजह से थोड़ा अंतर आ सकता है लेकिन मैं दोगुणा अभ्यास करने के लिए तैयार हूँ।'

वर्ष 2016 में Rajput ने निशानेबाज़ी छोड़ने की ठान ली थी और वह अपने जीवन के सबसे अंधकारमय चरण में थे पर किसी ने उनसे कहा कि उनकी क्षमता सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने की है।

वह कुछ शब्द Sanjeev Rajput के दिमाग और दिल में आज भी हैं और वह टोक्यो में अपना सपना पूरा करने के लिए तैयार हैं।