Rajyavardhan Singh Rathore और भारत के पहले निशानेबाज़ी पदक की कहानी 

Rajyavardhan Singh Rathore, an Indian shooter who won the first individual silver medal for the country in 2004 Summer Olympics, at his Polo Road house, New Delhi.  (Photo by Qamar Sibtain/The The India Today Group via Getty Images)
Rajyavardhan Singh Rathore, an Indian shooter who won the first individual silver medal for the country in 2004 Summer Olympics, at his Polo Road house, New Delhi. (Photo by Qamar Sibtain/The The India Today Group via Getty Images)

भारत के ओलिंपिक इतिहास में व्यक्तिगत पदक जीतने वालों की सूची में कई महान खिलाड़ी शामिल हैं जिनकी कहानी खेल प्रेमियों को आज भी याद हैं। टोक्यो 2020 हर सप्ताह आपको बताएगा भारत के व्यक्तिगत पदक विजेताओं की कहानी और इस भाग में हम आपको बताएँगे कैसे एक फौजी Rajyavardhan Singh Rathore ने जीता भारत का पहला ओलिंपिक निशानेबाज़ी पदक। 

पहले की कहानी

भारत के खेल इतिहास में निशानेबाज़ी की चर्चा बीसवीं सदी के अंत तक नहीं होती थी लेकिन 2004 एथेंस ओलिंपिक खेलों ने सब कुछ बदल दिया और इसका केवल Rajyavardhan Singh Rathore थे। राजस्थान के रहने वाले Rathore ने निशानेबाज़ी 28 वर्ष की आयु में शुरू करी लेकिन फौजी होने के कारण उन्हें सीखने में ज़्यादा कठनाई नहीं हुई।

अपना निशानेबाज़ी करियर की 1998 में शुरुआत करने के बाद Rathore ने बहुत जल्द अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल कर ली और साल 2002 के कॉमनवेल्थ खेलों में उन्होंने स्वर्ण अपने नाम किया। मेनचेस्टर में स्वर्ण जीतने के बाद Rathore अपने प्रदर्शन को एक अलग स्तर पर ले गए और अगले कुछ महीनों में आयोजित हर प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन दिखाया।

विश्व शॉटगन चैंपियनशिप में कांस्य, विश्व कप में स्वर्ण और एशिआई क्ले शूटिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतने के बाद भारत के निशानेबाज़ का आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया था लेकिन उन्हें पता था कि ओलिंपिक खेलों में पदक जीतना आसान नहीं होगा। अपनी तैयारी को विश्व स्तरीय बनाने के लिए Rathore ने पूर्व विश्व चैंपियन Luca Marini और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व ओलिंपिक स्वर्ण Russell Mark विजेता की सहायता ली जिसके कारण उनका खेल और सुधर गया।

'मैडल ऑफ़ ग्लोरी' नामक कार्यक्रम में बात करते हुए उन्होंने कहा, "एथेंस ओलिंपिक खेलों से पहले मैंने हर एक दिन बहुत कड़ा अभ्यास किया और मैंने यह सुनिश्चित किया कि इस प्रतियोगिता की भव्यता से मेरे प्रदर्शन पर कोई असर न पड़े। मैं चाहता था की जब मैं एथेंस पहुँच कर निशानेबाज़ी करूँ तो वह वातावरण मुझे परिचित लगे।"

"मैंने ओलिंपिक निशानेबाज़ी रेंज की बहुत सारी फोटो खींच ली थी और वीडियो भी बनाये जो मैं सोने से पहले उनका अध्ययन करता था। मैं कल्पना में अपने आप को ओलिंपिक प्रतियोगिता में भाग लेते हुए देखता था।"

भारत के Rajyavardhan Rathore (बाएं) 2004 ओलिंपिक खेलों में निशानेबाज़ी प्रतियोगिता में भाग लेते हुए।
भारत के Rajyavardhan Rathore (बाएं) 2004 ओलिंपिक खेलों में निशानेबाज़ी प्रतियोगिता में भाग लेते हुए।
2004 Getty Images

कैसे जीते पदक

शानदार फॉर्म और बेहतरीन तैयारी के साथ Rajyavardhan Rathore ने ओलिंपिक खेलों में प्रवेश किया और डबल ट्रैप प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए तत्पर थे। संयुक्त अरब अमीरात Ahmed Al Maktoum, चीन के Wang Zheng और स्वीडन के Håkan Dahlby पदक जीतने के प्रबल दावेदार थे लेकिन Rajyavardhan Singh Rathore चुनौती के लिए तैयार थे।

डबल ट्रैप के क्वालीफाइंग राउंड में Rathore की शुरुआत अच्छी नहीं रही लेकिन तीन मौकों में उन्होंने 135 अंक बनाये और फाइनल में अपनी जगह बना ली। Al Maktoum ने क्वालीफाइंग राउंड में 144 अंक बनाये और उनका स्वर्ण लगभग सुनिश्चित था लेकिन रजत पदक के लिए एक बेहद रोमांचक प्रतिस्पर्धा चल रही थी और उसमे Rathore भी शामिल थे।

Rathore ने अद्भुत निशानेबाज़ी दिखाते हुए फाइनल राउंड में 44 अंक प्राप्त किया और चीन के Wang Zheng को पछाड़ते हुए भारत के ओलिंपिक इतिहास का पहला रजत पदक जीत लिया। दृढ निश्चय और राष्ट्रप्रेम से भरे हुए एक फौजी ने वह कर दिखाया जो भारत के किसी निशानेबाज़ ने पहले कभी न किया था। 

अपनी पदक जीत के बारे में बात करते हुए उन्होंने स्पोर्टस्टार को 2018 में कहा, "ओलिंपिक पदक जीतना किसी भी खिलाड़ी के जीवन सर्वश्रेष्ठ क्षण होता है और मेरे लिए यह अत्यधिक हर्ष का मौका है कि अपने देश को मैंने उसके लिए रजत पदक जीता।"

परिणाम

Rathore के पदक ने निशानेबाज़ी को राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बना दिया और भारत के ओलिंपिक सफर को एक नया मोड़ दिया। Abhinav Bindra, Gagan Narang और कई अन्य ओलिंपिक सितारों ने उनसे प्रेरणा ली और भारत को सफलता दिलाई। बीजिंग में भारत का पहला स्वर्ण जीतने वाले Bindra आज भी अपने स्वर्ण जीत का कुछ श्रेय Rathore को देते हैं।

एथेंस में रजत जीतने के बाद Rathore ने 2006 विश्व एशियाई खेलों में रजत जीता और पांच साल में बीस से अधिक अंतर्राष्ट्रीय पदक अपने नाम किये। बीजिंग में आयोजित 2008 ओलिंपिक खेलों में Rathore भारतीय दल के ध्वजधारक थे और हालांकि वह दूसरा पदक नहीं जीत पाए लेकिन उन्होंने Abhinav Bindra को स्वर्ण हासिल करते हुए देखा।

Rathore की विजय ने निशानेबाज़ी की एक नयी पीढ़ी को जन्म दिया और आने वाले टोक्यो 2020 ओलिंपिक खेलों में भारत अपना सबसे बड़ा निशानेबाज़ों का समूह भेजेगा।