स्वतंत्र भारत का जन्म और पहला ओलिंपिक स्वर्ण पदक

लंदन में आयोजित 1948 ओलिंपिक खेलों में भारतीय टीम स्पेन के खिलाफ मैच खेलती हुई।
लंदन में आयोजित 1948 ओलिंपिक खेलों में भारतीय टीम स्पेन के खिलाफ मैच खेलती हुई।

ओलिंपिक खेलों का इतिहास चैंपियन खिलाड़ियों, अद्भुत कहानियों और कीर्तिमानों से भरा हुआ है लेकिन हर चार साल में एक बार आयोजित होने वाले प्रतियोगिता में कुछ ऐसे क्षण होते हैं जो सदैव याद किये जाते हैं। हर सप्ताह हम आपको ऐसे ही एक क्षण के बारे में बताते हैं जिसने विश्व भर में खेल प्रेमियों को भावुक कर दिया और इस भाग में पढ़िए स्वतंत्र भारत के पहले ओलिंपिक स्वर्ण की कहानी। 

पहले कि कहानी

भारत का ओलिंपिक सफर साल 1900 में ही प्रारम्भ हो चुका था और पुरुषों की हॉकी टीम ने पूरे विश्व में अपना दबदबा बनाया हुआ था जिसका प्रमाण था उनके द्वारा जीते हुए तीन लगातार ओलिंपिक स्वर्ण। लंदन में आयोजित 1948 ओलिंपिक खेल विशेष थे क्योंकि यह स्वतंत्र भारत के लिए पहला प्रतियोगिता थी।

लंदन ओलिंपिक खेलों से एक वर्ष पहले हुए विभाजन के कारण भारत के भाग लेने पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा क्योंकि हॉकी टीम के अनेक महत्वपूर्ण सदस्य पाकिस्तान चले गए। Niaz Khan, Shah Rukh Muhammad और AS Dara जैसे कई प्रमुख खिलाड़ी पाकिस्तान चले गए जिसके कारण टीम बहुत कमज़ोर हो गयी थी।

भारतीय हॉकी संघ के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती थी क्योंकि अनेक खिलाड़ी जा चुके थे और ओलिंपिक खेलों के लिए एक नयी टीम को खड़ा करना कठिन कार्य था। संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में शायद भारत के लिए एक नवीन अवसर के रूप में आई और किसी को अपेक्षा नहीं थी कि यह टीम आने वाली कई पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्वरुप बन जाएगी।

राष्ट्रिय स्तर पर विख्यात लेकिन अंतर्राष्ट्रीय खेलों में अनुभवहीन खिलाड़ी जैसे Kishan Lal, KD Singh Babu, Patrick Jansen, Leslie Claudius and Balbir Singh भारतीय टीम में शामिल कर लिए गए। Kishan Lal को कप्तान बनाया गया जबकि Jansen, Babu और Balbir Singh पर गोल मारने की ज़िम्मेदारी थी।

ओलिंपिक खेलों में क्या हुआ?

स्वतंत्र भारत की 20 खिलाड़ियों की टीम 1948 ओलिंपिक खेलों में भाग लेने के लिए लंदन पहुंची और उन्हें ग्रुप ए में चुना गया। इस ग्रुप में भारत के साथ थे अर्जेंटीना, ऑस्ट्रिया और स्पेन जबकि पाकिस्तान के ग्रुप में थे नीदरलैंड, बेल्जियम, फ्रांस और डेनमार्क।

भारत ने ओलिंपिक खेलों में शानदार शुरुआत करते हुए ऑस्ट्रिया को पहले मैच में 8-0 से पराजित करते हुए पदक दावेदारी का एक प्रत्यक्ष संकेत दिया। पहले मैच में KD Singh Babu ने दो गोल और Patrick Jansen ने हैट्रिक दागी। कुछ दिन बाद उनका दूसरा मुकाबला अर्जेंटीना से था और इस बार पहले मैच से बेहतर प्रदर्शन दिखाते हुए 9-1 से मुकाबला जीत लिया। यह मुकाबला थोड़ा विशेष था क्योंकि पहली बार विश्व ने Balbir Singh की प्रतिभा और कुशलता को देखा। 

ग्रुप दौर के आखरी मैच में भारत का मुकाबला स्पेन से हुआ और Balbir Singh ने फिर से शानदार प्रदर्शन दिखाते हुए टीम को 2-0 जीत दिलाई। सेमीफाइनल में भारत को नीदरलैंड का सामना करना पड़ा और एक कठिन मुकाबले के बाद 2-1 से जीत हासिल करते हुए उन्होंने फ़ाइनल में प्रवेश कर लिया। दुसरे सेमीफाइनल में ग्रेट ब्रिटैन ने पाकिस्तान को हराया और भारत के साथ स्वर्ण पदक का मुकाबला पक्का कर लिया।

ओलिंपिक खेलों के फाइनल में भारत के सामने था ग्रेट ब्रिटैन जो अपने तीसरे हॉकी स्वर्ण पदक की खोज कर रहा था। फाइनल मुकाबला वेम्ब्ले स्टेडियम में था और वहां भारतीय टीम कि खेल शैली के विपरीत परिस्थितियां थी। 

भारत को अपने खेल में परिवर्तन लाना पड़ा लेकिन कठिन परिस्थितियों में सफलता पाना इस टीम की विशेषता थी और अच्छे जूते होने के कारण उन्हें शुरुआती समय के बाद ज़्यादा परेशानी नहीं हुई। Balbir Singh ने भारत के लिए मैच का पहला गोल दाग कर मेज़बान टीम को संकट में डाल दिया और Jansen ने हाफ समाप्त होने से पहले बढ़त को दुगना कर दिया।

मुकाबले में वापसी करने के लिए ग्रेट ब्रिटैन को दुसरे हाफ में एक गोल की ज़रुरत थी लेकिन मैच में इससे ठीक विपरीत हुआ। अपने अद्भुत प्रदर्शन को बरक़रार रखते हुए एक और गोल मारा जिसके कारण स्वर्ण पदक मेज़बान टीम के हाथ से लगभग जा चुका था। भारत स्वर्ण पदक की ओर बढ़ रहा था और जब Tarlochan Singh ने चौथा गोल दागा तो उप महाद्वीप से आयी इस टीम ने इतिहास रच दिया।

Balbir Singh ने 2018 में हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए बताया, "उस क्षण को घटे 70 साल हो चुके हैं लेकिन मुझे वह एकदम कल जैसा लगता है। हज़ारों अंग्रेज़ों के सामने जब वेम्ब्ले में भारत का ध्वज लहर रहा था तो मुझे स्वतंत्रता की असली परिभाषा समझ आयी। घर बैठे लाखों भारतीयों के लिए यह बहुत गर्व की बात थी और जब हमारा राष्ट्र गान बजा तो मुझे ऐसे लगा जैसे मैं उड़ रहा हूँ।"

एक साल के दर्द और संघर्ष के बाद एक स्वतंत्र भारत को एक होने और गर्वान्वित होने का सुनहरा अवसर मिला।

परिणाम

लंदन ओलिंपिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम की स्वर्ण जीत इतिहास के सबसे बेहतरीन क्षणों में से एक है और इसने कई पीढ़ियों पर काफी गहरा असर छोड़ा। अगले चार ओलिंपिक खेलों में भारत ने अपना अद्भुत प्रदर्शन जारी रखा और तीन स्वर्ण पदक जीते।

Balbir Singh का खेल जीवन लंदन खेलों ने पूरी तरह से बदल दिया और वह भारत के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ हॉकी खिलाड़ियों में से एक बने। KD Singh Babu और Leslie Claudius जैसे खिलाड़ियों ने भी आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरित किया।

साल 1980 के बाद भारत ने अभी तक हॉकी में ओलिंपिक पदक नहीं जीता है लेकिन टोक्यो 2020 में वह 1948 खेलों में भाग लेने वाली टीम से प्रेरणा लेकर स्थिति बदलने का प्रयास करेगी।