कैसे Leander Paes ने 44 साल बाद जीता भारत का व्यक्तिगत ओलिंपिक पदक

1996 एटलांटा ओलिंपिक खेलों की पुरुष सिंगल्स टेनिस प्रतियोगिता के पदक विजेता भारत के Leander Paes (कांस्य), स्पेन के Sergi Bruguera (रजत) और  अमरीका के Andre Agassi ख़ुशी मनाते हुए। (फोटो गेट्टी इमेजेस के Gary Prior द्वारा)
1996 एटलांटा ओलिंपिक खेलों की पुरुष सिंगल्स टेनिस प्रतियोगिता के पदक विजेता भारत के Leander Paes (कांस्य), स्पेन के Sergi Bruguera (रजत) और अमरीका के Andre Agassi ख़ुशी मनाते हुए। (फोटो गेट्टी इमेजेस के Gary Prior द्वारा)

भारत के ओलिंपिक इतिहास में व्यक्तिगत पदक जीतने वालों की सूची में कई महान खिलाड़ी शामिल हैं जिनकी कहानी खेल प्रेमियों को आज भी याद हैं। टोक्यो 2020 हर सप्ताह आपको बताएगा भारत के व्यक्तिगत पदक विजेताओं की कहानी और इस भाग में हम आपको बताएँगे कैसे एक युवा Leander Paes ने भारत को 44 साल बाद ओलिंपिक सफलता दिलाई। 

पहले की कहानी

पहलवान KD Jadhav ने 1952 ओलिंपिक खेलों में स्वंतंत्र भारत का पहला व्यक्तिगत पदक जीता था लेकिन हेलसिंकी में हासिल हुई उस सफलता के बाद चार दशक तक उसे कोई भी नहीं दोहरा पाया था। धावक Milkha Singh ने 1960 रोम ओलिंपिक खेलों में विश्व विख्यात दौड़ में अपने कौशल का परिचय दिया था लेकिन पदक से चूक गए जबकि 1984 ओलिंपिक खेलों में धावक PT Usha को भी चौथा स्थान ही मिला।

भारत के टेनिस इतिहास में Ramanathan Krishnan, Ramesh Krishnan और Vijay Amritraj जैसे नाम विख्यात थे लेकिन किसी ने भी विशेष अंतर्राष्ट्रीय सफलता पाई थी। एक खेल परिवार से आने वाले Leander Paes 1996 एटलांटा ओलिंपिक खेलों की तैयारी चार साल से कर रहे थे और उन्हें वाइल्डकार्ड से प्रवेश मिल गया।

एक पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण एटलांटा का खेल वातावरण अन्य शहरों से बहुत अलग था और भारतीय मौसम में खेलने वाले Paes ने इन परिस्तिथियों में सफलता पाने के लिए विशेष योजना बनायी। उन्होंने दक्षिण अमरीका के देशों में आयोजित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और अपना खेल उस वातावरण के अनुसार ढाल लिया।

अपनी तैयारी के बारे में बात करते हुए, उन्होंने ओलिंपिक चैनल को बताया, "मैंने एटलांटा खेलों के लिए बहुत विशेष तरह से तैयारी करी थी और पूरा करने में मुझे चार साल लग गए। प्रो प्रतियोगिताओं में हिस्सा न लेकर मैं दक्षिण अमरीका के हार्ड कोर्ट में भी खेला जिसकी वजह से मैं एटलांटा के स्टोन माउंटेन के वातावरण के लिए तैयार था।"

कड़ा अभ्यास, दृढ निश्चय और सही रणनीति के कारण Paes का आत्मविश्वास बहुत ऊँचे स्तर पर था और भाग्य ने भी उनका साथ दिया जब विश्व के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी Pete Sampras ने अपना नाम ओलिंपिक खेलों से वापस ले लिया।

कैसे जीता पदक

एटलांटा ओलिंपिक खेलों में Leander Paes की शुरुआत अच्छी नहीं रही और पहले मैच के पहले सेट में अमरीका के Richey Reneberg ने उन्हें 7-6 हरा दिया लेकिन भारत के 22 वर्षीय खिलाड़ी ने बेहतरीन आत्मविश्वास से अगले दो सेट में वापसी करि और मैच जीत लिया।

अगले राउंड में Paes का मुकाबला वेनेज़ुएला के Nicolas Pereira से हुआ और उस मैच में अपने प्रतिद्वंदी को एक भी मौका न देते हुए उन्होंने 6-2, 6-3 से मुकाबला जीत लिया। जैसे ओलिंपिक प्रतियोगिता आगे बढ़ रही थी, Paes का आत्मविश्वास बढ़ता रहा और उन्होंने अगले दो मुकाबले बहुत आसानी से जीत लिए।

भारत के Leander Paes 1996 ओलिंपिक खेलों में पुरुषों की सिंगल्स प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीतने के बाद पदक पटल पर समारोह में भाग लेते हुए।
भारत के Leander Paes 1996 ओलिंपिक खेलों में पुरुषों की सिंगल्स प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीतने के बाद पदक पटल पर समारोह में भाग लेते हुए।
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सेमीफाइनल में Paes का मुकाबला अमरीका के विश्व विख्यात खिलाड़ी और ग्रैंड स्लैम चैंपियन Andre Agassi से हुआ। मैच के पहले सेट में Paes ने Agassi को कड़ी टक्कर दी लेकिन टाईब्रेक में अमरीका के खिलाड़ी ने अपनी कुशलता का परिचय दिया और 7-6 से जीत लिया। दुसरे सेट में Agassi ने Paes को मैच अपने नियंत्रण में करने का मौका नहीं दिया और मुकाबला सीधे सेट में जीत लिया।

ओलिंपिक खेलों की टेनिस प्रतियोगिता में 1996 एटलांटा ओलिंपिक खेलों से पहले सेमिफाइनल में पहुँचने वाले हर खिलाड़ी को पदक प्रदान किया जाता था लेकिन नियम परिवर्तन के कारण Paes को कांस्य जीतने के लिए एक और मैच खेलना पड़ा।

भारत और दुसरे व्यक्तिगत ओलिंपिक पदक के बीच थे ब्राज़ील के Fernando Meligeni और Leander Paes के जीवन का यह सबसे कठिन मुकाबला होने वाला था। Agassi के विरुद्ध मिली पराजय में Paes की कलाई में चोट आ गयी थी और उन्हें बहुत दर्द भी हो रहा था।

मैच का पहला सेट Meligeni ने 6-3 से अपने नाम किया और तब ऐसा लगा जैसे भारत को व्यक्तिगत पदक जीतने के लिए चार साल और इंतज़ार करना पड़ेगा लेकिन तभी Paes अपने खेल के स्तर में एक जादुई सुधर लेकर आये। कांस्य पदक के इस मुकाबले में अविश्वसनीय टेनिस खेलते हुए भारत के इस युवा खिलाड़ी ने अगला सेट बहुत आसानी से जीत लिया।

अब Leander Paes और कांस्य पदक के बीच में सिर्फ एक सेट था जो की Meligeni आसानी ने नहीं हारने वाले थे। एटलांटा के जादू की बात करने वाले Paes ने 6-4 से तीसरा सेट जीता और भारत को 44 साल बाद व्यक्तिगत ओलिंपिक सफलता दिलाई।

उस फाइनल को याद करते हुए Paes ने बताया, "पहला सेट हारने के बाद और मैं दुसरे सेट में 1-2 हार रहा था लेकिन तभी कुछ जादुई हुआ और मैं अगले 45 मिनट के लिए एक 'ज़ोन' में चला गया। उसके बाद क्या हुआ मुझे अच्छी तरह याद नही है।"

Paes के इस ख़िताब ने भारत में उन्हें एक राष्ट्र स्तर का सितारा बना दिया और पूरे देश को उनके ऊपर गर्व था।

आगे की कहानी

एटलांटा में पदक जीत को Leander Paes आज भी अपने जीवन का सबसे जादुई क्षण मानते हैं। उनका कहना है, "उस क्षण के बारे में बात करते हुए आज भी मेरे रोएं खड़े हो जाते हैं क्योंकि अपने देशवासियों के लिए खेलना किसी भी व्यक्तिगत प्रतियोगिता से ज़्यादा बड़ी बात है।"

एटलांटा ओलिंपिक खेलों में सफलता के बाद Leander Paes ने अगले कुछ सालों में अपना रुख डबल्स की ओर किया और आने वाले दो दशकों तक कई ख़िताब जीते। Paes ने अपने देश के Mahesh Bhupathi के साथ डबल्स सांझेदारी बनायी और कई ख़िताब अपने नाम किये।

साल 1998 में Paes और Bhupathi ने बहुत अच्छा खेलना शुरू किया और तीन ग्रैंड स्लैम के सेमीफाइनल में प्रवेश किया। उसी वर्ष Leander Paes ने एक सिंगल्स प्रतियोगिता में Pete Sampras को भी हराया और उसके थोड़े समय पहले न्यूपोर्ट में अपना एकमात्र एटीपी ख़िताब भी जीता। अगले 20 सालों में Paes ने अपने टेनिस करियर में आठ डबल्स ख़िताब और दस मिक्स्ड डबल्स ख़िताब जीते। Martina Navratilova, Martina Hingis और Radek Stepanek के साथ मिलकर Paes ने डबल्स की दुनिया में अपना दबदबा बनाये रखा।

सिंगल्स में ओलिंपिक सफलता के बाद Paes ने 2000 सिडनी, 2004 एथेंस, 2008 बीजिंग, 2012 लंदन और 2016 रियो खेलों में भाग लिया लेकिन पदक नहीं जीत पाए। डबल्स के ओलिंपिक मुकाबलों में परिणाम कुछ भी रहे हों लेकिन Paes की एटलांटा में उस जीत ने हज़ारों युवाओं को प्रेरित किया।