कैसे 'आयरन लेडी ऑफ इंडिया' - Karnam Malleswari ने सिडनी में अपने देश को गौरवान्वित किया

2000 के सिडनी ओलंपिक खेलों के दौरान भारत की Karnam Malleswari एक्शन में। (Martin Rose/Bongarts/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)
2000 के सिडनी ओलंपिक खेलों के दौरान भारत की Karnam Malleswari एक्शन में। (Martin Rose/Bongarts/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)

भारत के ओलंपिक इतिहास में व्यक्तिगत पदक जीतने वालों की सूची में कई महान खिलाड़ी शामिल हैं जिनकी कहानी खेल प्रेमियों को आज भी याद हैं। टोक्यो 2020 हर सप्ताह आपको बताएगा भारत के व्यक्तिगत पदक खिलाड़ियों की कहानी, और इस भाग में हम आपको बताएंगे कि कैसे Karnam Malleswari एक घरेलू नाम बन गई जब उन्होंने 2000 में सिडनी खेलों में वेटलिफ्टिंग में कांस्य पदक जीता था।

यह वर्ष 2000 में था जब Karnam Malleswari नाम की भारतीय महिला वेटलिफ्टर ने सिडनी में ओलंपिक खेलों में 69 किग्रा वर्ग में कांस्य पदक जीतकर अपने देश को गौरवान्वित किया था।

उस जीत के बारे में अधिक आश्चर्यजनक बात यह थी कि वह ओलंपिक में पदक जीतने वाली देश की पहली महिला बन गई थीं।

उनसे पहले और आज तक किसी भी अन्य भारतीय महिला ने ओलंपिक में इस अनुशासन में व्यक्तिगत पदक जीतने की उपलब्धि हासिल नहीं की है।

खैर, इस ‘आयरन लेडी ऑफ इंडिया’ की कहानी क्या है? चलिए जानते हैं।

पहले की कहानी

उनका जन्म और पालन-पोषण आंध्र प्रदेश में Amadalavalasa के पास Voosavanipeta में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

Malleswari, जिनकी चार बहनें हैं, ने 12 वर्ष की उम्र में वेटलिफ्टिंग में रुचि ली, और अपने कोच Neelamshetty Appanna के तहत प्रशिक्षण शुरू किया।

वेटलिफ्टिंग में अपने करियर को आगे बढ़ाने के लिए, Malleswari अपनी बहन के साथ दिल्ली चली गई, और जल्द ही उन्होंने भारतीय खेल प्राधिकरण का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

1990 में, वह राष्ट्रीय शिविर में शामिल हुईं और उनका करियर एक आकार लेने लगा।

तीन साल बाद विश्व चैंपियनशिप में उन्होंने तीसरा स्थान पाया। Malleswari ने तब 54 किग्रा वर्ग में लगातार दो मौकों पर 1994 और 1995 में विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। हालांकि, वह स्वर्ण पदक जीतने की अपनी हैट्रिक पूरी नहीं कर सकीं, क्योंकि एक साल बाद 1996 में, Malleswari फिर से विश्व चैंपियनशिप में तीसरे स्थान पर रहीं।

लगातार जीत और प्रभावशाली प्रदर्शन की श्रृंखला के बाद, वह कुछ प्रमुखता हासिल करने लगी।

हालांकि, समय के साथ, उन्होंने अधिक मसल वेट प्राप्त किया और 63 किग्रा श्रेणी में प्रवेश किया। इसने Malleswari को 1998 के एशियाई खेलों में एक रजत पदक जीतने में मदद की, एक ऐसा इवेंट जहां उन्होंने चार साल पहले एक रजत पदक जीता था, लेकिन एक अलग श्रेणी (54 किग्रा) में।

दो साल बाद, 2000 में सिडनी खेलों में, महिलाओं के भारोत्तोलन को इतिहास में पहली बार ओलंपिक अनुसूची में जोड़ा गया था, और तब सभी की निगाहें भारत की Malleswari पर थीं, जिन्होंने 1995 में अपनी विश्व चैम्पियनशिप की जीत के बाद से स्वर्ण नहीं जीता था।

इसके अलावा, तब तक वह 69-किग्रा श्रेणी में चली गई थीं, एक ऐसी श्रेणी जिसमें उन्होंने वैश्विक स्तर पर कभी प्रदर्शन नहीं किया था।

कैसे उन्होंने खेलों में पदक जीता?

69 किग्रा वर्ग में, उनके अलावा, दो अन्य महिला वेटलिफ्टर्स थीं - हंगरी की Erzsebet Markus और चीन की Lin Weining, जो ओलंपिक खेलों में पदक जीतने के लिए पसंदीदा खिलाड़ियों में दो थीं।

फाइनल में, सभी तीन प्रतिभागियों ने 'स्नैच’ श्रेणी में प्रत्येक में 110 किग्रा वजन उठाया।

इस बीच, क्लीन एंड जर्क श्रेणियों में, Weining ने अपने पहले प्रयास में अविश्वसनीय 132.5 किलोग्राम वजन उठाते हुए बढ़त हासिल की, जबकि Karnam और Markus अपने पहले लिफ्ट में 125 किग्रा भार उठाने में सफल रही।

हालांकि, Weining ने उस पर सुधार नहीं किया, जबकि Markus ने संयुक्त रूप से दूसरे स्थान पर जाने के अपने दूसरे प्रयास में 132.5 किग्रा को सफलतापूर्वक उठाया, जबकि Karnam ने अपने दूसरे प्रयास में 130 किग्रा उठा लिया।

अब सारी बात अंतिम क्लीन एंड जर्क लिफ्ट पर आ खड़ी हो गई। जैसा कि उनके दोनों प्रतियोगियों ने 242.5 किलोग्राम का कुल भार उठाया था, Karnam 2.5 किलोग्राम से पीछे चल रही थी। रजत पदक जीतने के लिए, उन्हें बॉडीवेट पर कम से कम 132.5 किलोग्राम भार उठाने की जरूरत थी और स्वर्ण पदक के लिए उन्हें 130 का भार उठाना पड़ना था।

इससे ठीक पहले, Karnam को उनके कोचों ने सलाह दी थी कि वह 137.5 किग्रा का भार उठा ले। हालांकि 7.5 किग्रा का अतिरिक्त वजन काफी जयदा था, और क्यूंकि उन्होंने अभ्यास में इस वजन को उठाया था, वह जानती थी कि वह यहां भी ऐसा कर सकती है।

हालांकि, Karnam Malleswari निर्णायक क्षण में लड़खड़ा गई। उन्होंने बारबेल को थोड़ी जल्दी उठा दिया और इससे उनके घुटने पर चोट लगी, जिसके कारण वह गिर गई।

परिणामस्वरूप, वह स्वर्ण पदक जीतने में असफल रही, लेकिन उन्होंने कांस्य पदक जीता और अपने देश के लिए इतिहास रच दिया।

भारत को तब मिला था एक नया हीरो!

(बाएं से दाएं), रजत पदक विजेता, हंगरी की Erzsebet Markus, स्वर्ण पदक विजेता, चीन की Weining Lin, और कांस्य पदक विजेता, भारत की Karnam Malleswari, सिडनी 2000 ओलंपिक खेलों में महिला 69 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग के बाद पोडियम पर पोज़ देती हुई। (फोटो क्रेडिट: Scott, Barbour/ALLSPORT)
(बाएं से दाएं), रजत पदक विजेता, हंगरी की Erzsebet Markus, स्वर्ण पदक विजेता, चीन की Weining Lin, और कांस्य पदक विजेता, भारत की Karnam Malleswari, सिडनी 2000 ओलंपिक खेलों में महिला 69 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग के बाद पोडियम पर पोज़ देती हुई। (फोटो क्रेडिट: Scott, Barbour/ALLSPORT)

“लोगों ने मेरे बारे में जो कहा उससे मैं प्रभावित नहीं थी। मुझे पता है कि मुझे क्या करना चाहिए, और मुझे क्या नहीं करना चाहिए। मुझे प्रतियोगिता में भाग लेना है, मंच पर जाना है और वजन उठाना है,” उन्होंने असाधारण उपलब्धि के बाद स्पोर्टस्टार को बताया।

उसके बाद की कहानी

2001 में एक घरेलू नाम बनने के बाद, Malleswari ने उसी साल मातृत्व अवकाश लिया था, और जब वह अगले साल ऑस्ट्रेलिया में राष्ट्रमंडल खेलों के लिए प्रशिक्षण ले रही थी, तो उनके पिता के दुखद निधन के कारण उन्हें उस इवेंट से नाम बाहर लेना पड़ा।

हालांकि, 'आयरन लेडी ऑफ़ इंडिया' या 'भारत की बेटी' - जैसा की तब भारत के प्रधान मंत्री, Atal Vihari Bajpayee ने उन्हें उनकी ओलंपिक करतब के बाद कहा था, ने अपने दूसरे ओलंपिक खेलों - एथेंस 2004 में भाग लिया, लेकिन अपनी वीरता को दोहराने में असफल रही।

उसके बाद, पीठ की गंभीर चोट से पीड़ित होने के कारण, भारत की पहली महिला ओलंपिक पदक विजेता ने खेल से अपनी सेवानिवृत्ति की घोषणा करने का फैसला किया।

“मुझे अपने देश की लड़कियों के लिए यह रास्ता बनाने में गर्व महसूस हो रहा है और वे अब पदक जीत रही हैं, जो बहुत अच्छा है। कुछ लोग मुझे आज भी कहते हैं, ’आपने यह सब शुरू किया है’, इसलिए मुझे खुशी है कि मैंने इस धारणा को बदल दिया है,” - Karnam Malleswari