शांत दिमाग़ वाले विजय कुमार ने भारत को दिलाया था ओलंपिक में पहला पिस्टल पदक

लंदन, इंग्लैंड - अगस्त 03: रजत पदक विजेता विजय कुमार (Photo by Lars Baron/Getty Images)
लंदन, इंग्लैंड - अगस्त 03: रजत पदक विजेता विजय कुमार (Photo by Lars Baron/Getty Images)

आर्मी के जवान ने इसके लिए नए नियमों को समझा था और विदेश में जाकर ट्रेनिंग करते हुए भारत के लिए जीता था ओलंपिक का रजत पदक

लंदन 2012 में Vijay Kumar के रजत पदक जीतने के पहले ही भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शूटिंग का हब कहा जाने लगा था। क्योंकि उनसे पहले पिछले दो ओलंपिक में Rajyavardhan Singh Rathore और Abhinav Bindra ओलंपिक में भारत को पदक दिला चुके थे।

जबकि बीजिंग 2008 में Gagang Narang भी ओलंपिक पदक जीतते जीतते रह गए थे, लेकिन लंदन 2012 में उन्होंने मौक़े को ज़ाया नहीं करते हुए देश के नाम उस ओलंपिक का पहला पदक दिला दिया था। गगन के पदक जीतने के बाद विजय कुमार ख़ुद पर दबाव महसूस करने लगे थे, लेकिन उन्होंने भी रजत के साथ देश का नाम रोशन किया।

भारत के इस शूटर ने अहम मौक़े पर संयम बरक़रार रखा और आख़िरी चार सेकंड्स में सबकुछ भूलते हुए निशाना केवल लक्ष्य पर ही लगाया। विजय 25 मीटर रैपिड फ़ायर पिस्टल में बहुत क़रीब से स्वर्ण पदक से ज़रूर चूक गए थे लेकिन देश के लिए रजत पदक जीत गए। इतना ही नहीं उन्होंने ओलंपिक इतिहास में भारत के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन में अपना अहम योगदान दिया।

कम उम्र में ही हो गया था शूटिंग से प्यार

पूर्व आर्मी जवान के सुपुत्र, विजय कुमार के लिए शूटिंग में प्यार बेहद कम उम्र से ही झलकने लगा था। लेकिन उन्होंने पहली बार इसमें हाथ तब आज़माया जब वह ख़ुद भारतीय आर्मी का हिस्सा बने। विजय के ट्रेनर ने उनकी क़ाबिलियत तुरंत परख ली थी और फिर उन्हें तराशने का काम शुरू हो गया था।

विजय कुमार ने भी अपनी प्रतिभा के साथ इंसाफ़ करते हुए 2006 कॉमनवेल्थ गेम्स में दो स्वर्ण पदक जीता और फिर उसी साल 25 मीटर पिस्टल में एशियन गेम्स में भी कांस्य पदक पर कब्ज़ा जमाया। 2007 में हुई एशियन चैंपियनशिप में वह दूसरे स्थान पर रहे और 2009 ISSF वर्ल्ड शूटिंग चैंपियनशिप में उन्होंने देश के लिए रजत पदक जीता।

इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अगले साल यानी 2010 में उन्होंने एक के बाद एक शानदार प्रदर्शन के साथ ख़ुद को ओलंपिक की दावेदारी में सबसे आगे ले आए थे। विजय ने 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में तीन स्वर्ण पदक और एक रजत पदक अपने नाम किया और फिर एशियन गेम्स में भी कांस्य पदक जीता, ये सभी 25 मीटर पिस्टल में ही आए थे।

2011 ISSF वर्ल्ड शूटिंग में एक बार फिर इस आर्मी जवान ने एक और रजत पदक जीतते हुए अपने पहले ओलंपिक में स्थान पक्का कर लिया था। लंदन 2012 के शूटिंग दल का हिस्सा तो वह बन गए थे, लेकिन असली इम्तिहान अभी शुरू हुआ था।

विजय कुमार को बहुत कम उम्र में ही हो गया था शूटिंग से प्यार।
विजय कुमार को बहुत कम उम्र में ही हो गया था शूटिंग से प्यार।

ये बदलाव Alexei Klimov के लिए घातक रहा और वह प्रारंभिक राउंड में 592 अंक हासिल करने के बावजूद पदक वाले मुक़ाबले से बाहर हो गए थे। लेकिन यहां पर विजय कुमार ने अपने ऊपर दबाव नहीं हावी होने दिया और अच्छे प्रदर्शन के साथ पदक की दावेदारी में बने रहे।

इसकी वजह ये भी थी कि ओलंपिक शुरू होने से ठीक एक महीना पहले वह अपने कोच Pavel Smirnov जर्मनी गए थे और वहां ख़ुद को बेहतर तरीक़ों से तैयार किया था।

इंडिया टुडे के साथ एक इंटरव्यू में विजय कुमार ने कहा था कि, ‘’हमें इसी तरह की चीज़ों के लिए तैयार किया जाता है।‘’

फ़ाइनल राउंड में विजय ने क्यूबा के Leirus Pupo के ख़िलाफ़ अपना सर्वश्रेष्ठ तो दिया लेकिन क्यूबियाई शूटर ने इतनी बढ़त हासिल कर ली थी कि विजय यहां से सभी के सभी पर्फ़ेक्ट स्कोर भी करते तो स्वर्ण पदक नहीं जीत पाते।

लेकिन विजय इससे हतोत्साहित नहीं हुए और संयम के साथ निशाना लगाते हुए रजत पदक पर कब्ज़ा जमा लिया था, और वह भी अपने पहले ही ओलंपिक में शामिल होते हुए। विजय के लिए ये एक सपने का साकार होने जैसा था, जो उन्होंने ज़िंदगी भर देखा था।

भारतीय शूटर ने इस ऐतिहासिक जीत को लेकर कहा कि, ‘’इससे पहले भी मैंने कई पदक जीते थे, लेकिन ये कुछ ऐसा था जो हमेशा से मेरी ख़्वाहिश थी। ओलंपिक पदक जीतने से बढ़कर और कुछ नहीं है।‘’

विजय कुमार की ज़िंदगी इस पदक जीतने के बाद भी बेहद साधारण रही, उन्हें सुबेदार मेजर बना दिया गया था। इसी पद पर से उन्हें 2017 में भारतीय आर्मी से सेवानृवति मिली, जिसके बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और अब उनके पास बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन की स्नातक डिग्री है।

हालांकि आगे आने वाले सालों में विजय कुमार ने एक साधारण ज़िंदगी जीना ही मुनासिब समझा, लेकिन देश हमेशा उनके द्वारा ओलंपिक में पहला पिस्टल पदक जीतने के लिए उनपर गर्व करता है और दूसरों के लिए विजय अब एक प्रेरणास्रोत हैं।