कोरोना काल में शोर्ड मरिन कैसे भारतीय महिला हॉकी टीम को रख रहे हैं मज़बूत

FIH महिला हॉकी विश्व कप के दौरान इटली और भारत के बीच हुए खेल के बाद भारत की महिला हॉकी टीम के कोच, Sjoerd Marijne खिलाड़ियों से बात करते हुए। (Christopher Lee/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)
FIH महिला हॉकी विश्व कप के दौरान इटली और भारत के बीच हुए खेल के बाद भारत की महिला हॉकी टीम के कोच, Sjoerd Marijne खिलाड़ियों से बात करते हुए। (Christopher Lee/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)

10 अक्टूबर को वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे मनाया जाता है और इस दिन मानसिक स्वास्थ्य पर रोशनी डाली जाती है। डच कोच भी भारतीय राष्ट्रीय महिला हॉकी टीम को कुछ यही गुर सिखा रहे हैं।

कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी से लड़ना आसान नहीं है। यह बीमारी शारीरिक आघात के साथ साथ मानसिक नुकसान भी पहुँचाती है। कोरोना वायरस जैसे मुश्किल दौर में मानसिक तनाव के मामले बढ़ते जा रहे हैं। वर्ल्ड हेल्थ ओर्गानईज़ेशन (World Health Organisation – WHO) ने भी पुष्टि कर बताया है कि इस महामारी ने लोगों की मानसिक ताकत पर वार किया है।

दिग्गज एथलीट भी इस सच्चाई से मुंह नहीं फेर रहे हैं और हाल फिलहाल में खेल जगत में ज़्यादा प्रतियोगिताओं का न होना उनके लिए चिंता का सबब है।

भारतीय राष्ट्रीय महिला हॉकी टीम के टीम के कोच शोर्ड मरिन (Sjoerd Marijne) का मानना है कि इस समय हालातों में ख़ुद को ढालना ही फायदेमंद है। इससे लड़ने के लिए टीमों को अलग अलग कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

ओलंपिक चैनल से बात करते हुए कोच शोर्ड मरिन ने कहा “हां, यह मददगार साबित होगा। अगर आप यह नहीं करेंगे तो आपका दिमाग आपके साथ खेलने लग जाएगा और ऐसे में अपने दिमाग की आवाजों को रोकना बहुत मुश्किल हो सकता है।”

“आपके दिमाग में एक आवाज़ कहेगी हाँ और एक कहेगी कि आप यह नहीं कर पाएंगे। आपको सभी नकारात्मक विचारों से बचना होगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो आप जूझते दिखेंगे।”

शोर्ड मरिन लगातार वह कार्य कर रहे हैं जिससे वह भारतीय महिला हॉकी टीम के मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रख सकें। (Photo by Christopher Lee/Getty Images)
शोर्ड मरिन लगातार वह कार्य कर रहे हैं जिससे वह भारतीय महिला हॉकी टीम के मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रख सकें। (Photo by Christopher Lee/Getty Images)
2018 Getty Images

ग़ौरतलब है कि WHO हर साल 10 अक्टूबर के दिन वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे के दिन मानसिक स्वस्थ से जुड़ी समस्याओं आर ध्यान देकर लोगों को इससे अवगत कराते हैं।

डच कोच शोर्ड मरिन खुद एक प्रेरक वक्ता हैं और उन्होंने खिलाड़ियों के मानसिक तनाव और मानसिक स्थिति पर बात की और साथ ही यह भी बताया कि वह कैसे भारतीय महिला हॉकी खिलाड़ियों की मदद कर रहे हैं

सवाल: जिससे आप प्रेम करते हैं, उससे दूर रहना मुश्किल होता हैं। खिलाड़ियों के लिए स्पर्धा और ट्रेनिंग से दूर रहना भी कुछ ऐसा ही है। आप इन हालातों को कैसा समझते हैं?

शोर्ड मरिन: यह सक्रिय रहने जैसा है। जैसा कि आप जानते हैं कि इन हालातों में जब आप 14 दिन का क्वारंटाइन करते हैं और अपने कमरे में ही रहते हैं तो यह और मुश्किल हो जाता है। हमने इस समय को फायदेमंद बनाने के लिए उपयोग किया।

सचेतन एक ऐसा मुद्दा है जिस पर हम फोकस कर रहे हैं। यही ऐसी हालातों से लड़ने का ज़रिया है। इससे आप हालातों को स्वीकार करते हैं। इसका मतलब यह है कि हम इसे बदल नहीं सकते। जब आप उन चीज़ों की चिंता करना छोड़ देंगे जो आपके हाथ में नहीं हैं, तब आप नकारात्मक सोच से दूर हो जाएंगे। यह आपको शांत रखता है। यह एक ऐसी चीज़ है जिससे हमने टीम को फॉलो करने को कहा।

सवाल: मानसिक स्वास्थ एक ऐसा विषय है जिसे भारत में बहुत ज़्यादा बढ़ावा नहीं मिलता। टीम ने आपकी मानसिकता में खुद को कैसे ढाला?

शोर्ड मरिन: इसमें समय लगता है, लेकिन लड़कियां इसे समझती भी हैं। उनके लिए मैंने इसे भागों में बांटा हैं। मैं उन्हें उस मुद्दे पर फोकस करने को कहंता हूं जो उनके हाथ में है। हमे यह नहीं पता कि यह महामारी खत्म कब होगी और न ही हम जानते हैं कि इसके बाद जीवन कैसा होगा। यह कुछ ऐसा है जिसे हम सुनना नहीं चाहते। जब भी आप इसके बारे में ज़्यादा सोचेंगे तब आप नकारात्मक हो जाएंगे, तो ऐसे में यही बेहतर है कि आप इन विचारों से बचें।

मैं अपनी बात करूँ तो मैं घर जाना चाहता था। मैं गुस्सा भी कर सकता था लेकिन उससे हालात न बदलते। अब मुझे इसी हालात से कुछ बेहतर करना था। यह एक व्यक्ति की मानसिक ताक़त पर निर्भर करता है।

जब भी मैं घर जाने का सोचता हूं, या उन चीज़ों के बारे में सोचता हूं जो मेरे हाथ में नहीं हैं तब मैं उदास हो जाता हूं और मेरी एनर्जी लेवल गिर जाता तो आप इसे कैसे संबोधित करते हैं ? मैं इसे जीवन में छोटे लक्ष्य रखने के तौर पर देखता हूं। हर संगठन में सभी के छोटे छोटे लक्ष्य होते हैं जिन्हें पाकर वह एक बड़े लक्ष्य की ओर जाते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मैं उस बड़े लक्ष्य के लिए हमेशा चिंतित नहीं रह सकता। बल्कि अगर मैं अपना लक्ष्य हासिल कर लूं तो उससे पूरे संगठन को फायदा होगा। ऐसे में मैं उस छोटे लक्ष्य को पूरा करने की कोशिश करते हूं और ना कि उस लक्ष्य के लिए परेशान होता हूं जो पूरे संगठन के लिए है। हमारा जीवन ऐसे ही सिधान्तों पर चलता है। हम हर दिन उस दिन के हिसाब से ही जीते हैं।

जब भी मैं घर जाने का सोचता हूं, या उन चीज़ों के बारे में सोचता हूं जो मेरे हाथ में नहीं हैं तब मैं उदास हो जाता हूं और मेरी एनर्जी लेवल गिर जाता तो आप इसे कैसे संबोधित करते हैं ? मैं इसे जीवन में छोटे लक्ष्य रखने के तौर पर देखता हूं। हर संगठन में सभी के छोटे छोटे लक्ष्य होते हैं जिन्हें पाकर वह एक बड़े लक्ष्य की ओर जाते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मैं उस बड़े लक्ष्य के लिए हमेशा चिंतित नहीं रह सकता। बल्कि अगर मैं अपना लक्ष्य हासिल कर लूं तो उससे पूरे संगठन को फायदा होगा। ऐसे में मैं उस छोटे लक्ष्य को पूरा करने की कोशिश करते हूं और ना कि उस लक्ष्य के लिए परेशान होता हूं जो पूरे संगठन के लिए है। हमारा जीवन ऐसे ही सिधान्तों पर चलता है। हम हर दिन उस दिन के हिसाब से ही जीते हैं।।

View this post on Instagram

All the good habits I’ve learned in India 😊

A post shared by Sjoerd Marijne (@sjoerdmarijne) on

हम हर बार इसके बारे में नहीं सोच सकते जो हमने आने वाले कुछ महीनों में करना है या आने वाले सालों में करना हैं, हम बस खुश रहने की आदत डाल सकते हैं।

इसका यह मतलब नहीं है कि हम कभी भी नकारात्मक नहीं सोचते। आप इसे खुद पर आने देंगे क्योंकि यह आम है। लेकिन जब भी आप कुछ ऐसा महसूस करते हैं तो आप ख़ुद से संबोधित करें।

सवाल: नकारात्मक विचारों को दूर रखना कितना मुश्किल है? आप यह कैसे पुख्ता करते हैं कि आप इसे रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में लागू करेंगे।?

शोर्ड मरिन: मुझे मालुम है कि यह करने से कहीं ज़्यादा इसके बारे में बोलना आसान लगता है। लेकिन हां, मुझे यह एहसास हुआ है कि उन चीज़ों में बारे में सोचना ज़्यादा फायदेमंद हैं जो हमारे हाथ में हैं बल्कि उनके बारे में नहीं जो हमारे हाथ में नहीं हैं। जैसे कि इस लॉकडाउन में मैंने एक किताब लिखना शुरू कर दिया क्योंकि यह मुझे ऊर्जा देता है। मुझे लगता है कि मैंने कुछ उपयोगी किया है, और यह उर्जा अगले दिन भी साथ रहती है।

मैं अपने कमरे में बैठकर फ़िल्में भी देख सकता हूं और न कि यह सोच सकता हूं कि मैं घर क्यों नहीं जा पा रहा। ऐसे में कुछ उपयोगी करने के बारे में भी मैं सोचता था। तो ऐसा करने से आप सकारात्मक उर्जा जमा कर लेते हैं और नकारात्मक विचारों से दूर रहते हैं।

सभी लड़कियां अपने रूटीन को फॉलो करती हैं और ऐसे हालातों में यह एक अच्छी आदत है।

सवाल: स्पर्धा और ट्रेनिंग करना ही एक एथलीट का मुख्य कार्य होता है। भारतीय महिला हॉकी टीम ने प्राकृतिक आवास से दूर रहने की आदत कैसे डाली?

शोर्ड मरिन: शुरुआत में यह अजीब था, लेकिन जैसा मैंने कहा कि यह हालातों के अनुकूल बनना है। इसमें यह बात अच्छी हुई कि उनका उनके परिवार से मिलना हो गया।

याद रखिए, कि उनमें खेलने की भूख थी। मुझे लगता है कि कई बार रोज़ की चीज़ों को तोड़ना अच्छा होता है और इस वजह से आप आराम भी कर सकते हैं और साथ ही आपकी भूख भी उबाल मारती रहती है।

जब उन्होंने लॉकडाउन के बाद अभ्यास करना शुरू किया तो उनमें वह भूख दिख रही थी।

सवाल: पहले समय में आपने इस टीम को सर्वश्रेष्ठ स्थान पर रहने के महत्व को बताया है। तो पिछले कुछ महीनों में यह समय कैसे बीता?

शोर्ड मरिन: इस अनिश्चितता के आने से चीज़ों मुश्किल तो हो गईं हैं, लेकिन मैं हालात को संभालने की कोशिश कर रहा हूं क्योंकि इन चीज़ों को मैं बदल नहीं सकता। यह उसी बारे में है कि किस चीज़ को आप रोक सकते हो किसे नहीं रोक सकता।

सवाल: आपको भविष्य कैसा लग रहा है?

शोर्ड मरिन: हम टोक्यो ओलंपिक गेम्स के हिसाब से तैयारी कर रहे हैं लेकिन हमें यह नहीं पता कि आने वाले समय में हम किसी स्पर्धा का भाग होंगे या नहीं। हॉकी में, मुकाबले खेलना बहुत ज़रूरी होता है, लेकिन हमे इसकी स्पष्टता नहीं है। ऐसे में हम सबसे अच्छी चीज़ कर रहे हैं जो कि सख़्त ट्रेनिंग है।

हॉकी इंडिया और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (Sports Authority of India – SAI) साथ मिलकर बहुत मेहनत कर रहे हैं ताकि हम वापस स्पर्धा कर सकें।

ऐसे में सबसे सही वही है जो हम कर सकते हैं साथ ही स्थितियों को वैसे ही कुबूल कर सकते हैं जैसे कि वह हैं। यह हालातों के अनुकूल होने जैसा है और उन चीज़ों को बेहतर करने जैसा है जो हमारे हाथ में हैं।

ओलिंपिक चैनल द्वारा!