सुंदरगढ़ का लाल Birendra Lakra हॉकी में रोशन कर रहा देश का नाम

बीरेंद्र लाकड़ा ने पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान दिलीप तिर्की को माना अपना आदर्श। (तस्वीर साभार: हॉकी इंडिया)
बीरेंद्र लाकड़ा ने पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान दिलीप तिर्की को माना अपना आदर्श। (तस्वीर साभार: हॉकी इंडिया)

हॉकी के इस डिफ़ेंडर ने अपने शुरुआती और लम्बे करियर के अलावा चोटों से वापसी करते हुए हॉकी के विकास के बारे में ओलंपिक चैनल से बात की।

ओडिशा के सुंदरगढ़ नगर ने भारतीय हॉकी टीमों को अनौपचारिक तौर पर लगातार कई बेहतरीन खिलाड़ी दिए हैं। पूर्व कप्तान Dilip Tirkey, Sunita Lakra और Asunta Lakra इसी जिले से ताल्लुक रखते हैं। इसी जिले के Ignace Tirkey, Bimal Lakra, Amit Rohidas जैसे खिलाड़ी और हाल ही में Dipsan Tirkey भी भारतीय टीम का हिस्सा बने हैं।

इसलिए जब Birendra Lakra का जन्म इस राज्य के उत्तर-पश्चिम जिले में हुआ, तो कहीं न कहीं यह तय माना जा रहा था कि वह एक दिन जरूर भारतीय हॉकी टीम के लिए खेलेंगे।

बीरेंद्र लाकड़ा ने पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान दिलीप तिर्की को माना अपना आदर्श। (तस्वीर साभार: हॉकी इंडिया)
बीरेंद्र लाकड़ा ने पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान दिलीप तिर्की को माना अपना आदर्श। (तस्वीर साभार: हॉकी इंडिया)

उन्होंने आगे कहा, "दशकों से लोगों ने हॉकी के इस खेल को हमेशा एक टाइम पास के तौर पर चुना है, यह लोगों को आर्थिक रूप से बहुत मदद नहीं करता है।”

शायद एक यह भी वजह हो सकती है, वहां से निकले बेहतरीन खिलाड़ियों ने कई बच्चों सहित बीरेंद्र लाकड़ा को भी प्रोत्साहित करने का काम किया।

उन्होंने कहा, “जब मैं बड़ा हो रहा था तो उस दौरान मेरी प्रेरणा दिलीप तिर्की थे। क्योंकि जब मैं छोटा था तो वह भारतीय हॉकी टीम के कप्तान थे। आप हर जगह उनके बारे में पढ़ सकते हैं। वह उस समय भारत के सबसे अच्छे खिलाड़ियों में से एक थे, और उन्होंने मुझे वास्तव में इस खेल को गंभीरता से लेने के लिए प्रेरित किया। उस समय हम बहुत सारे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के बारे में नहीं जानते थे, न ही उनसे कोई संपर्क हो पाता था। इसलिए हम आसानी से यह जानते थे कि दिलीप तिर्की कौन हैं, मेरे मन में उनके प्रति हमेशा सम्मान रहा है।"

रियो में नहीं हो पाए शामिल

इस साल बीरेंद्र लाकड़ा का भारतीय हॉकी टीम में एक दशक पूरा हो गया है, जो अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। क्योंकि बीते समय में उन्हें दो बड़ी लिगामेंट (एसीएल) चोटें आई हैं। इन सबके बावजूद आज वह टीम का हिस्सा हैं।

पहली चोट ने उन्हें साल 2016 में रियो ओलंपिक में शामिल न होने पर मजबूर कर दिया, जो वास्तव में एक मुश्किल समय था। भारतीय हॉकी डिफेंडर ने कहा, "उस समय जब आप घायल होते हैं तो यह आपके लिए बहुत मुश्किल होता है।"

"विशेष रूप से अगर एक खिलाड़ी टीम में खेलता है। क्योंकि जब आप एक व्यक्तिगत खेल को खेल रहे होते हैं, तो आपके साथ ट्रेनिंग करने के लिए कोई साथी मौजूद नहीं होता है। ऐसे में जब भी मैंने अपने आपको कमज़ोर महसूस किया तो मुझे हमेशा सभी का बहुत साथ मिला”।

चोट के कारण रियो ओलंपिक से बाहर होने के बाद, बीरेंद्र लाकड़ा की टोक्यो 2020 पर नज़र। (तस्वीर साभार: हॉकी इंडिया)
चोट के कारण रियो ओलंपिक से बाहर होने के बाद, बीरेंद्र लाकड़ा की टोक्यो 2020 पर नज़र। (तस्वीर साभार: हॉकी इंडिया)

"जब मैंने फिर से मैदान पर कदम रखा, तो मुझे एहसास हुआ कि खेल में मानसिक पहलू सबसे महत्वपूर्ण है। आपको हमेशा मानसिक तौर पर बेहद मजबूत होने की जरूरत है। आप कभी भी नकारात्मक विचारों को अपनी सोच पर हावी होने की अनुमति नहीं दे सकते हैं।"

बीरेंद्र लाकड़ा केवल पांच महीनों के लिए एक्शन से दूर रहे। टीम के फिजियो उनकी जल्द वापसी के लिए एक दिन में फिजियोथेरेपी के तीन सत्र कराते थे। इसलिए जब एसीएल 2018 में उन्हें फिर इस दौर से गुजरना पड़ा, तो उन्हें अपना पुराना अनुभव काफी काम आया।

उन्होंने कहा, "जब मुझे फिर चोट लगी तो मुझे यह पता था कि इससे पहले भी मैं बहुत खराब दौर से गुजर चुका हूं। इसलिए मैं तैयार था और मैंने यह सुनिश्चित किया कि मैं हमेशा अपने उद्देश्य पर अपना ध्यान केंद्रित करूंगा। उस वक्त मेरा उद्देश्य भुवनेश्वर में होने वाले वर्ल्ड कप से पहले टीम में वापसी करना था।”

कैसे विकसित हुआ हॉकी का खेल

बीते दशक में पुरुषों की हॉकी में कई बदलाव देखे गए हैं, मसलन नियमों और विश्लेषण (एनालाइज़) करने का तरीकों में कई बदलाव हुए हैं। इसके अलावा बेल्जियम एक नई बड़ी चुनौती बनकर उभरा, जिसने ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैंड जैसे देशों पर अपना दबदबा बनाने में सफलता हासिल की।

बिरेंद्र लाकड़ा को लगता है कि अब खेल की गति तेज़ हो गई है और अगर आप हर एक टीम का गहन विश्लेषण करते हैं तो आप पाएंगे कि किसी भी टीम को हराना आज के समय में आसान नहीं है। उन्होंने कहा, "यह खेल 35 मिनट के दो हिस्सों में होता है, यह पहले उतना तेज़ नहीं था जितना अब है।"

"जब मैंने खेलना शुरू किया था तो दुनियाभर की टीमें वीडियो और स्टैट्स का विश्लेषण बहुत अधिक नहीं करती थीं। लेकिन अगर आप आज के खेल को देखेंगे तो आज हर एक छोटी से छोटी चीज़ भी बहुत मायने रखती हैं और मैं वास्तव में खुश हूं कि हमारी टीम इन परिवर्तनों को अमल में लाकर पहले से बहुत विकसित हुई है।”

टोक्यो में पोडियम स्थान हासिल करना है लक्ष्य

बीरेंद्र लाकड़ा भारतीय हॉकी टीम के गोलकीपर पीआर श्रीजेश के अच्छे दोस्त हैं, लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। इन दोनों खिलाड़ियों के बीच उम्र का अंतर केवल दो वर्ष का है, टीम में इस अनुभवी खिलाड़ी ने जल्दी खेलना शुरू कर दिया था, जिसने उन्हें ‘सीनीयर’ बना दिया था।

पीआर श्रीजेश लगातार अपनी टीम को प्रेरित करते हुए और मैदान पर बात करते हुए दिखाई देते थे। उन्होंने एक बार कहा था कि वह कभी-कभार अपनी हताशा से छुटकारा पाने के लिए संघर्ष करते हैं। उनके उग्र व्यवहार की वजह से बीरेंद्र लकड़ा शुरुआत में उनसे बातचीत करने और संपर्क करने में हिचकिचाहट महसूस करते थे।

उन्होंने कहा, "जब मैं उनके सामने (पीआर श्रीजेश) ट्रेनिंग करता या खेलता, तो मैं हमेशा थोड़ा सतर्क रहता था कि मुझसे कोई गलती न हो, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि वह मुझसे परेशान हों।"

हालांकि, जब नेशनल कैम्प के दौरान दोनों रूममेट बने तो उनकी बीच अच्छी मित्रता हो गई। जिससे उन्हें एक दूसरे को समझने में मदद मिली और दोनों एक साथ फिल्में भी देखने गए।

बीरेंद्र लाकड़ा अब खुद एक सीनियर के रूप में टीम का हिस्सा हैं और श्रीजेश और रूपिंदर पाल सिंह के साथ वह युवाओं के खेल को और भी बेहतर करने और उन्हें प्रेरित करने के लिए जिम्मेदार हैं। यह एक ऐसी भूमिका है जिसमें वह बहुत गर्व महसूस करने का दावा करते हैं।

भारतीय हॉकी टीम ने साल 2020 की शुरुआत काफी अच्छी की थी और डिफेंडर का मानना है कि टीम सही रास्ते पर आगे बढ़ रही है।

उन्होंने कहा, "हम पोडियम के लिए लक्ष्य कर रहे थे, अगले साल भी ऐसा ही होगा। अब तैयार होने के लिए अधिक समय के साथ, हम निश्चित तौर पर सही समय पर अपनी बेहतरीन फॉर्म में होंगे और जैसा हम चाहते हैं ठीक वैसा ही होगा।”

यह निश्चित रूप से किसी ऐसे व्यक्ति के लिए गौरव की बात होगी, जो एक ऐसे क्षेत्र से आता है जहां बांस की छड़ी से बच्चे इस खेल को खेलना शुरू करते हैं और फिर राष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ियों के साथ खेलकर देश का नाम रोशन करते हैं।