आने वाली पीढ़ी के लिए एक मिसाल बनना चाहते हैं भारतीय मुक्केबाज़ सतीश कुमार

Satish Kumar.
Satish Kumar.

अपने भारवर्ग में ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई करने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज़ सतीश कुमार खेलों में अपने इस अवसर को यादगार बनाना चाहते हैं।

एशियन ओलंपिक मुक्केबाज़ी क्वालिफ़ायर्स में जाने से पहले भारत के सुपर हेविवेट (+91 किलोग्राम) मुक्केबाज़ Satish Kumar का प्रदर्शन उतना शानदार नहीं रहा था।

MC Mary Kom, Amit Paghal, Vikash Krishan और Lovlina Borgohain पर देश की निगाहें मजबूती से टिकी हुई थी। इसके बावजूद ये भारतीय मुक्केबाज़ बिना किसी अतिरिक्त दबाव के क्वालिफ़ायर्स में जाने के लिए ख़ुश था।

जॉर्डन के अम्मान में शुरुआती दौर में एक बाई मिलने की वजह से अब भारतीय मुक्केबाज़ के सामने केवल मंगोलिया की Daivii Otgonbayar खड़े थे, जिनको हराते ही सतीश कुमार को टोक्यो ओलंपिक का टिकट मिल जाने वाला था।

मुकाबले के दिन संघर्ष कर रहे मंगोलियाई मुक्केबाज़ के खिलाफ भारतीय मुक्केबाज़ ने टोक्यो खेलों में अपनी जगह सील करने के लिए एक शानदार बाउट लड़ी।

सतीश कुमार ने हाल ही में एक विशेष बातचीत में ओलंपिक चैनल से कहा कि, "मेरे लिए वो एक मज़ेदार पल था, क्योंकि मैं भारत से सुपर हेविवेट वर्ग में ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई करने वाला पहला मुक्केबाज़ बन गया था।"

“मुझे लगता है कि मैनें पहली बार सुपर हेविवेट वर्ग से क्वालिफ़ाई करके भविष्य की पीढ़ियों को रास्ता दिखाया है और भविष्य में भी इस वर्ग से क्वालिफ़ाई करने के लिए उनमें विश्वास पैदा किया है। वो ख़ुद से पूछ सकते हैं कि अगर सतीश ऐसा कर सकता है तो मैं क्यों नहीं कर सकता?”

हालांकि खेलों के लिए क्वालिफ़ाई करने से सतीश कुमार को ओलंपिक की दौड़ में अपनी पहली बाधा पार करने में मदद मिली, उन्हें पता है कि ये काम अभी तक पूरा नहीं हुआ है। भारतीय मुक्केबाज़ को अम्मान में खेले गए मुक़ाबलों से बढ़कर तैयारी करनी होगी, जहां उन्हें उससे ज़्यादा चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

भारत के Satish Kumar (रेड) और इंग्लैंड (ब्लू) के Frazer Clarke ने गोल्ड कोस्ट 2018 राष्ट्रमंडल खेलों के 10वें दिन पुरुषों की +91 किग्रा फ़ाइनल बाउट बॉक्सिंग में प्रतिस्पर्धा की। (Chris Hyde/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)
भारत के Satish Kumar (रेड) और इंग्लैंड (ब्लू) के Frazer Clarke ने गोल्ड कोस्ट 2018 राष्ट्रमंडल खेलों के 10वें दिन पुरुषों की +91 किग्रा फ़ाइनल बाउट बॉक्सिंग में प्रतिस्पर्धा की। (Chris Hyde/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)
2018 Getty Images

अपने पसंदीदा मुक्केबाज़ और विश्व विजेता उज्बेकिस्तान के Bakhodir Jalolov के खिलाफ सतीश कुमार का मुक़ाबला चुनौतीपूर्ण था, जहां जलोलोव ने सतीश कुमार को हराया था।

भारतीय मुक्केबाज़ को पता है कि चुनौती यहां से कठिन हो जाती है। “पिछले कुछ वर्षों में सुपर हेविवेट डिविज़न बहुत मजबूत हो गया है। डिविज़न में सबसे युवा बहुत अच्छे हैं और प्रदर्शन में भी अच्छा किया है।

सुपर हेविवेट वर्ग में ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई करने वाले भारत के पहले मुक्केबाज़ बनना शानदार है। लेकिन मुझे पता है कि मेरे पास अभी भी ओलंपिक से पहले एक लंबा रास्ता तय करना है।

सेना के जवान से जाने-माने मुक्केबाज़ बने सतीश

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के निवासी सतीश कुमार ने शुरुआती दिनों में कभी भी नहीं सोचा कि वो एक मुक्केबाज़ बनेंगे।

उन्होंने कहा कि, “भारत के किसी भी युवा की तरह मैं भी मैदान पर अच्छा करना चाहता था। “मैं क्रिकेट, हॉकी और कबड्डी खेला करता था। मेरे यहां के लोगों को पता नहीं होता कि इस उम्र में वो क्या करना चाहते हैं।”

वो जल्द ही अपने बड़े भाई की तरह भारतीय सेना में शामिल होना चाहते थे, जहां उन्हें मुक्केबाज़ी से अवगत कराया गया था।

सशस्त्र बल के कोचों ने उन्हें खेल में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया और उन्होंने उनकी ताक़त का सही जगह इस्तेमाल करने को कहा। सतीश कुमार ने मुक्केबाज़ी को आसानी से अपने जीवन का हिस्सा बना लिया और जल्द ही घरेलू सर्किट में ख़ुद को स्थापित करने के लिए तैयारी करने लगे।

हालाँकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर सफलता मिलने से कुछ समय पहले इस भारतीय मुक्केबाज़ ने ये सुनिश्चित किया कि वो हर गुज़रती बाउट के साथ अपने प्रदर्शन में सुधार करें।

कुमाऊँ रेजिमेंट का एक सेल्फ-कन्फ्यूज्ड फ्रंट-फ़ुट बॉक्सर और सेना का जवान भले ही परफ़ेक्ट नहीं था, लेकिन उन्होंने अपनी तैयारियों को रूकने नहीं दिया। उन्होंने कहा कि, "मैं सबसे तकनीकी बॉक्सर नहीं हूं, लेकिन मेरे पास बहुत धीरज है, जिसका मैं लाभ उठाने की कोशिश करता हूं। "मेरा उद्देश्य आम तौर पर रिंग में अपने प्रतिद्वंद्वी को थकाकर हराना रहता है और उन्हें अपने मुक्कों को याद करना होता है।"

खेल को सुधारने के लिए काम कर रहे हैं सतीश कुमार

इस रणनीति से सतीश कुमार को अब तक फ़ायदा ही हुआ है, लेकिन उन्हें पता है कि जब वो टोक्यो ओलंपिक में रिंग में उतरेंगे तो उन्हें अपने पैतरों में और भी बहुत कुछ जोड़ना होगा।

जहां कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी के कारण नेशनल लॉकडाउन की वजह से सब कुछ बंद पड़ा है इसके बावजूद सतीश की ट्रेनिंग पर ब्रेक नहीं लगा है। वो लगातार अपना लक्ष्य हासिल करने की दिशा में काम कर रहे हैं। सतीश कुमार ने कहा, "मुझे लगता है कि लॉकडाउन के बावजूद मेरी ट्रेनिंग अच्छी चल रही है।"

उन्होंने कहा, 'कोचों ने साप्ताहिक ट्रेनिंग कार्यक्रमों की शुरुआत की है, जिनका पालन किए जाने की उम्मीद है। और फिर वीडियो सत्र भी हैं, जहां अगर मुझे कोई संदेह है या अगर मुझे कुछ कठिन लगता है, तो समस्या का समाधान किया जाता है। हम उन्हें अपने ट्रेनिंग का वीडियो भी भेजते हैं और वे हमें बताते रहते हैं कि क्या करना है।”

अब उनका घर पर सीमित माहौल में वर्कआउट कितना मदद करेगा, वो तो केवल वक्त ही बता सकता है। लेकिन एक बात निश्चित है, सतीश कुमार ने भारतीय मुक्केबाज़ों को सपने देखने का एक कारण ज़रूर दे दिया है।

ओलंपिक चैनल द्वारा!