जानिए कैसे क़िस्मत ने शिव सिंह को बना दिया मुक्केबाज़ों का गुरू

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अपने कॉलेज के दिनों में पूरे लगन के साथ मुक्केबाज़ी के दस्ताने पहनने वाले अनुभवी मुक्केबाज़ी कोच ने दृढ़ विश्वास और जुनून के साथ एक नए रास्ते पर चलने का फैसला किया।

द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता शिव सिंह (Shiv Singh) के मुक्केबाज़ी में करियर बनाने में उनके भाग्य की भूमिका अधिक रही है।

सिंह ने ओलंपिक चैनल के साथ बातचीत में कहा, "मैंने हर एक अवसर को एक चुनौती की तरह देखा है।"

उन्होंने कहा, "मुक्केबाज़ी को इसलिए चुना क्योंकि कॉलेज के एक सीनियर ने सोचा कि मैं इसमें अच्छा कर सकता हूं, या नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स, पटियाला में डिप्लोमा के लिए नामांकन कर सकता हूं, मैंने हर पल का आनंद लिया है क्योंकि इससे मुझे चुनौती का अहसास होता है। जीवन में हर बार कुछ अलग किया।”

ये उनका विश्वास और जुनून है, जिसकी वजह से हमने पिछले सालों में गौरव भिदुरी (Gaurav Bhiduri), अखिल कुमार (Akhil Kumar), सिमरनजीत कौर (Simranjit Kaur) और विजेंदर सिंह (Vijender Singh) जैसे मुक्केबाजों को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देखा है।

एक हादसे ने तोड़ दिए हॉकी के सपने

शिव सिंह अमृतसर के गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में एक प्रतिभाशाली हॉकी खिलाड़ी थे, तब एक सड़क दुर्घटना ने उनके हॉकी को सपनों को चकनाचूर कर दिया। अपने घुटने को घायल करने के बाद उन्हें भ्रमित स्थिति में देखा गया।

उन्होंने याद करते हुए कहा, "पहले हमें आज की तरह मेडिकल सुविधाएँ नहीं मिलती थीं। मैंने अपने पास एक डॉक्टर से सलाह ली, लेकिन वो ऑपरेशन करना नहीं चाहते थे।”

“उन्हें डर था कि इससे घुटने में दर्द होगा। तो, उन्होंने मुझसे एक मालिश करने वाले से परामर्श करने के लिए कहा। मालिश करने वाले ने घुटने में कुछ किया और मैं फिर से चलने लगा था। लेकिन मैं इसपर बहुत अधिक जोर देना नहीं चाहता था और थोड़ा डर गया था।”

हॉकी की पिच पर लौटते समय शिव सिंह के लिए ये एक दूर का सपना लग रहा था, लेकिन उनके अंदर के एथलीट ने उन्हें निराश नहीं किया।

उन्होंने कहा कि, "घुटने एक समस्या थी, लेकिन मैं नियमित रूप से जिम जाता था। यही वह जगह है जहाँ मैं रॉस से मिला, जो फिजी का एक छात्र था। जब वो अपनी रूटीम से गुज़रता था, तो जब भी मुझे मौका मिलता, मैं उसकी तरह करने की कोशिश करता था।

“मेरे फुटवर्क में समस्या थी, लेकिन मेरे मुक्कों में कुछ वास्तविक शक्ति थी। और रॉस ने इसे नोटिस किया।"

पंचिंग बैग पर अभ्यास करने के लिए सभी को सूचित करते हुए, सीनियर मुक्केबाज़ ने शिव सिंह से भी प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए कहा।

उन्होंने कहा, 'उन्हें एक संयमी साथी की जरूरत थी, और मुझे एक एवेन्यू की जरूरत थी जो मुझे व्यस्त रख सके। इसलिए, मुझे लगता है कि ये हम दोनों के लिए अच्छा रहा।

अगले वर्षों में, शिव सिंह ने रॉस से खेल के बारे में बहुत कुछ जाना। दोनों 1970 के दशक में ऐसे मुक्केबाज़ बन गए, जिनके बारे में इंटर-यूनिवर्सिटी लेवल पर सबसे ज्यादा बातें होती थी। 1970 में भारतीय मुक्केबाज़ ने दो रजत पदक जीता था।

इस दौरान शिव सिंह ने कॉलेज टीम के अपने जुनियर्स को मुक्केबाज़ी के गुर सिखाए, ये वो चीज थी, जिसने बाद में उनके करियर में मदद की।

शिव सिंह ने बताया कि, “उन दिनों कॉलेजों में बॉक्सिंग कोचों की कमी होती थी। आपके पास एक फिजिकल एजुकेशन का निदेशक होता था। इसलिए आमतौर पर कोच की भूमिका निभाने के लिए सीनियर ही होते थे।”

“मैं कॉलेज की टीम को तैयार करता था। ये काफी हद तक उस ज्ञान से आधार कर कर रहा था, जो मैंने अपने सीनियर्स के साथ सीखी और प्रशिक्षण ली थी।”

किस्मत से बन गए कोच

शिव सिंह सीबीआई जैसी जांच एजेंसी में कैरियर बनाना चाह रहे थे, उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि मुक्केबाज़ी उन्हें इस कदर पैसा और प्रसिद्धि देगी। चंडीगढ़ के शिव सिंह ने कभी भी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में भाग लेने का सपना नहीं देखा था। 

लेकिन भाग्य में कुछ और ही लिखा था, 3-स्टार एमेच्योर इंटरनेशनल बॉक्सिंग एसोसिएशन कोचिंग लाइसेंस ने उन्हें एक ऐसे रास्ते पर पहुंचा दिया, जिससे वो कभी दूर नहीं जा सके।

उन्होंने बताया कि, "मुझे याद है, एक बार हजारीबाग में एक इंटरव्यू (इंटेलिजेंस ब्यूरो के लिए) के लिए बुलाया जा रहा था।" 

“लेकिन निर्धारित इंटरव्यू से ठीक एक दिन पहले पत्र मिला, कोई रास्ता नहीं था कि मैं झारखंड में एक जगह पर जा सकूं, जो मेरे से लगभग 1,500 किमी दूर था। 

"हालांकि कुछ लोगों ने मदद की, लेकिन मुझे ऐसा कोई रास्ता नहीं दिख रहा है जहाँ से मैं (चंडीगढ़ में) घर पहुँचूँ, अपने प्रमाण-पत्र और अन्य ज़रूरी दस्तावेज़ों को इकट्ठा करूँ और समय रहते हजारीबाग पहुँच जाऊँ। 

"ये तब था जब मेरे एक दोस्त ने मुझे एनआईएस और वहाँ के कोचिंग कोर्स के बारे में बताया। वो हाल ही में पटियाला गया था।" 

शिव सिंह ने राष्ट्रीय खेल संस्थान में प्रवेश प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और मुक्केबाज़ी डिप्लोमा पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया।

जर्मनी से सीखे मुक्केबाज़ी के गुर

1980-81 बैच के साथ पास होने के बाद, शिव सिंह ने आने वाले वर्षों में भारतीय सेना में रेजिमेंट टीमों के साथ कुछ खास समय बिताया।

सिंह का मानना ​​है कि इस अवधि ने उन्हें 1995 में एक एडवांस डिप्लोमा कार्यक्रम के लिए जर्मनी जाने से पहले कोच के रूप में काम करने में मदद की।

जबकि कई लोगों ने शिव सिंह के वापस लौटने और यूरोप में अपना करियर बनाने की उम्मीद कर ली थी, लेकिन भारतीय कोच ने वापसी करने का फैसला किया।

शिव सिंह ने भारतीय जूनियर सेट अप में अखिल कुमार और विजेंदर सिंह जैसे भारतीय मुक्केबाज़ी सितारों को ट्रेनिंग दी है। (Cameron Spencer/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)
शिव सिंह ने भारतीय जूनियर सेट अप में अखिल कुमार और विजेंदर सिंह जैसे भारतीय मुक्केबाज़ी सितारों को ट्रेनिंग दी है। (Cameron Spencer/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)
2006 Getty Images

उन्होंने जर्मनी में मुझे नौकरी देने और पीएचडी पूरा करने का अवसर दिया लेकिन मैं हमेशा घर आना चाहता था और यहाँ के लोगों की मदद करना चाहता था।"

एक साल बाद घर वापस लौटे, शिव सिंह ने भारतीय जुनियर सेट-अप को संवारने का पदभार संभाला, क्योंकि वो 'जड़ों को मजबूत करना चाहते थे।

"मुझे लगता है कि ये वास्तव में महत्वपूर्ण है कि हमारे पास जूनियर और सब-जूनियर स्तरों पर बेहतरीन कोच हैं। अगर किसी के पास उस स्तर पर कोई स्किल हो तो बस उसे तरासने की जरूरत होती है। 

अखिल कुमार, मोहम्मद अली क़मर, एएल लकड़ा, दिनेश कुमार और विजेंदर सिंह के साथ उस समय भी जूनियर सेट-अप में शिव सिंह देश के सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाज़ बनने के लिए युवा प्रतिभाओं को अवसर दे रहे थे। 

उनका मानना है कि "ये पॉवर सिर्फ कोच के पास होती है।" 

“कोई भी कोच जो किसी प्रतिभा को देखता है, उन्हें अलग तरह से व्यवहार करना पड़ता है। तभी आप उन्हें विकसित होते देख सकते हैं। लेकिन आपको यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता होती है कि ग्रुप के अन्य लोग इसे नोटिस न करें, नहीं तो इसका नेगेटिव प्रभाव पड़ता है।” 

भारतीय मुक्केबाज़ों को विभिन्न स्तरों पर तैयार करने में तीन दशकों से अधिक समय लगाने के बाद, शिव सिंह को द्रोणाचार्य पुरस्कार एक दम सही समय पर मिला है। क्योंकि शिव सिंह वो इंसान हैं, जो मानते हैं कि मौका मिलना बहुत बड़ी बात होती है।

ओलिंपिक चैनल द्वारा!