एक्सक्लूसिव: तीरंदाज़ी के अपने शानदार करियर पर बोले डोला और राहुल बनर्जी

लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड में मेन्स रैंकिंग राउंड के दौरान एक्शन में भारत के Rahul Banerjee. (Julia Vynokurova / गेटी इमेजेज़ द्वारा फोटो)
लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड में मेन्स रैंकिंग राउंड के दौरान एक्शन में भारत के Rahul Banerjee. (Julia Vynokurova / गेटी इमेजेज़ द्वारा फोटो)

तीरंदाज़ भाई-बहन अपने करियर के शुरुआती दिनों, एक-दूसरे के सहारे, ओलंपिक और अपने फ़ाउंडेशन के अनुभवों को ओलंपिक चैनल के साथ साझा कर रहे हैं।

बीते दो दशकों में भारत तीरंदाज़ी की दुनिया में एक प्रमुख दावेदार के रूप में उभरा है। इस सफर की शुरुआत तब हुई जब 1989 में भारतीय तीरंदाज लिम्बा राम ने एशियन चैंपियनशिप में व्यक्तिगत सिल्वर मेडल जीता और टीम के साथ गोल्ड मेडल जीता। उसके बाद से ही देश में कई सितारों को उभरता हुआ देखा गया, उनमें से दो तीरंदाज़ एक ही परिवार के हैं।

Dola Banarjee और Rahul Banarjee भारतीय तीरंदाज़ी को शीर्ष पर पहुंचाने में सबसे अग्रणी रहे हैं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके द्वारा किए गए शानदार प्रदर्शन ने देश को मानचित्र पर लाने में मदद की है।

तीरंदाजी विश्व कप में स्वर्ण पदक, एशियाई खेलों में कई पदक, अर्जुन पुरस्कार और ओलंपिक खेलों में हिस्सा लेने सहित इन दोनों ही तीरंदाज़ो का करियर लगभग एक जैसा रहा है।

2010 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में इन भाई-बहन का प्रदर्शन शानदार रहा, दोनों ने ही एक गोल्ड और ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। एक ओर जहां डोला ने व्यक्तिगत स्पर्धा में ब्रॉन्ज़ और टीम स्पर्धा में गोल्ड जीता तो वहीं राहुल ने ठीक इसके विपरीत मेडल जीते।

हालांकि, एक चीज़ है जो संभव नहीं हो सकी, बड़ी बहन डोला बनर्जी अपना डेब्यू जूनियर टूर्नामेंट नहीं जीत सकीं।

तीरंदाज़ी के लिए धीरे-धीरे जागा प्यार

कोई भी एथलीट जो कम उम्र में ही किसी एक खेल को चुन लेता है, उनके पास इसको लेकर जागे जुनून पर बात करने के लिए बहुत सारी बाते होती हैं। वे कहते हैं कि यह कुछ ऐसा है जो उन्हें बहुत खुशी देता है। हालांकि, डोला बनर्जी के लिए यह मामला थोड़ा उल्टा था। उन्हें 9 साल की उम्र में तीरंदाज़ी में आने के लिए जोर दिया गया था।

हाल ही में ओलंपिक चैनल से हुई बातचीत में उन्होंने कहा, “मैं अपने घर के पास ही एक खुले मैदान में शाम को खेला करती थी, जो बारानगर क्लब का ही हिस्सा था। वहां एक कोच खुले में ही तीरंदाज़ी सिखाते थे और एक दिन उन्होंने अचानक मेरे पिता से मेरा दाख़िला कराने के लिए पूछ लिया।”

इस खेल के स्थिर और धीमी गति से खेले जाने की वजह से चंचंल मन वाली डोला को यह बिल्कुल रास नहीं आया। उनके लिये यह बहुत उबाऊ था। शुरुआत में कोच उनसे बस सीनियर तीरंदाज़ों को देखने के लिए कहते थे, जो वहां पर प्रैक्टिस किया करते थे। यह सब उन्हें और अजीब लगने लगा।  

हालांकि, नौ वर्षीय डोलाा की धारणा में बदलाव तब आया जब उन्होंने सफलता का स्वाद चखा। उन्होंने खुलासा करते हुए कहा, “इस खेल को शुरू करने के छह महीने बाद एक राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में मैंने बंगाल की ओर से प्रतिभागिता की। जहां मैंने कांस्य पदक जीता और मुझे लगता है इसी के बाद से मेरी दिलचस्पी इस खेल में बढ़ने लगी।”

इसके अलावा इस मामले पर टकराव की एक बात और थी। एक ओर जहां उनके पिता चाहते थे कि डोला एक तीरंदाज़ बनें, वहीं उनकी मां चाहती थीं कि वह एक संगीतकार बनें। क्योंकि वह खुद संगीतकारों के घराने से थीं। 

आपको बता दें, डोला और राहुल बनर्जी के चचेरे भाई शान एक लोकप्रिय बॉलीवुड गायक हैं, इसलिए उनके लिए इस फील्ड में आगे बढ़ने का मौका बहुत अच्छा था। किशोरावस्था में वह क्लासिकल सिंगर बनने के लिए प्रशिक्षण भी ले रही थीं। लेकिन एक बार जब डोला ने अपने तीरंदाज़ी करियर को लेकर सफर करना शुरू किया तो उनका गायकी कहीं पीछे छूट गई।

संयोग से छोटे भाई के लिए भी यह कहानी एक जैसी ही है। उन्होने कहा, “यह तो है कि मैंने दीदी की वजह से तीरंदाज़ी शुरू की, लेकिन मुझे कराटे में या फिर पायलट बनने में अधिक दिलचस्पी थी। लेकिन फिर जब मैंने राज्य स्तर पर एक पदक जीता तो मुझे याद है कि यह एक बड़ी बात रही - मेरे स्कूल के प्रिंसिपल ने मुझे सम्मानित किया। द टाइम्स ऑफ इंडिया में एक छोटा सा आर्टिकल भी छपा था। इसके बाद ही तीरंदाज़ी मुझे पसंद आने लगी।”

घर में ही एक आदर्श, प्रतिद्वंदी और कोच

अब जबकि इस खेल में भाई-बहन दोनों आमतौर पर निरंतर ही एक साथ शामिल होने लगे तो छोटे भाई को अपनी बड़ी बहन की बराबरी करने का दबाव बना रहता था। राहुल बनर्जी के लिए उनकी बड़ी बहन डोला का प्रदर्शन एक बेंचमार्क बन गया।  

राहुल ने कहा, “मैं हमेशा उनके जैसा ही करने की सोचा करता था। जब मैंने ठीक से खेलना शुरू किया तो दीदी कई राष्ट्रीय पदक जीत चुकी थीं। वह भारतीय टीम का हिस्सा थीं और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में हिस्सा लेने के लिए यात्रा किया करती थीं। मैं अपने लिए भी ऐसा ही जीवन चाहता था।”

दोनों भाई-बहन के बीच सामान्य सा रिश्ता था, जहां बड़ी बहन की भूमिका का दबाव बना रहता था। डोला बनर्जी ने कहा, “राहुल के जन्म के बाद मुझे ज़िम्मेदारी का अहसास हुआ। यही वजह थी कि मैं उसके साथ थोड़ा सख्ती से पेश आती थी। मुझे लगता है कि वह मुझसे डरता था।”

बीते वर्षों को याद करते हुए इसपर छोटे भाई राहुल ने विनम्र भाव से अपने सहमति व्यक्त की। उन्होंने कहा, “ हां, यह सच है। वह मुझे मेरे माता-पिता से भी अधिक डांटती थीं! यहां तक कि मेरे दोस्त भी उनसे डरते थे। इसलिए वे मेरे साथ कभी नहीं उलझते थे क्योंकि उन्हें दीदी के बारे में अच्छी तरह पता था।”

हालांकि, वह इसके लिए शुक्रगुज़ार भी हैं, क्योंकि उन्हें लंबे समय तक घर से दूर रहने के दौरान लगातार सहयोग भी मिला। उन्होंने कहा, “कई एथलीट भाग्यशाली नहीं होते हैं, जो लंबी यात्रा के दौरान परिवार के किसी सदस्य के साथ होते हैं। मुझे लगता है कि 2006 से 2013 तक हम दोनों भारत के लिए खेल रहे थे, घर से दूर कभी नेशनल कैम्प में तो कभी टूर्नामेंटों में हम एक साथ थे। इसकी वजह से मुझे काफी मदद और सहारा मिला।”

यह भूमिकाएं 2010 में उलट गईं, जिसमें राहुल ने प्रेरक की भूमिका निभाई। डोला बनर्जी को 2009 के अंत में पीठ में चोट लग गई थी और फरवरी में नेशनल कैम्प शुरू होने से पहले उन्हें फिर से अपने पैरों पर खड़ा होना था।

इसपर बात करते हुए डोला ने कहा, “मैं एक डॉक्टर के पास गई और उसने मुझे बताया कि मुझे स्लिप डिस्क है। मेरे L4 और L5 वर्टिब्रे (कशेरुक) इससे प्रभावित थे। उन्होंने मुझे बताया कि सर्जरी करानी होगी।”

हालांकि, इस सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ी। 30 वर्षीय इस तीरंदाज़ को इसकी जगह पर एक मुश्किल काम करने को कहा गया। उन्होंने हर महीने आठ किलो वजन कम किया।

हालांकि उन्हें इससे गुज़रना बिल्कुल पसंद नहीं था, इसके बावजूद न चाहते हुए भी उन्हें इससे गुज़रना ही पड़ा जहां उन्होंने एक महीने में आठ किलो वजन कम किया।

Dola Banerjee (Daniel Berehulak/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)
Dola Banerjee (Daniel Berehulak/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)
2010 Getty Images

आखिरकार वह राष्ट्रमंडल खेलों के लिए सेलेक्शन ट्रायल में शीर्ष पर रहीं। एशियाई खेलों में एक और कांस्य जीतने से पहले उन्होंने वहां एक स्वर्ण और कांस्य पदक जीता। लेकिन उस टूर्नामेंट के बाद पीठ की चोट फिर से बढ़ गई।

उन्होंने कहा, “मैंने दिल्ली में एक डॉक्टर से परामर्श लिया और हालांकि उन्होंने सर्जरी के लिए नहीं कहा, जिसका मुझे संदेह था। उन्होंने सुझाव दिया कि मैं एक्यूपंक्चर के माध्यम से ठीक हो सकती हूं। यह मैंने पूरी लगन के साथ किया था। लेकिन इसने मुझे खेल से चार महीने तक बाहर कर दिया था।”

इसके बावजूद इस दौरान फॉर्म में चल रही भारतीय तीरंदाजी टीम में शामिल डोला बनर्जी ने ओलंपिक क्वालिफाइंग टूर्नामेंट में रजत पदक जीता और 2012 ओलंपिक के लिए अपनी जगह पक्की की।

उनका उद्देश्य पूरी तरह से ओलंपिक खेलों पर ध्यान केंद्रित करने पर था। लेकिन डोला नेशनल कैम्प का हिस्सा नहीं बन सकीं, 2011 में उन्होंने कोई भी टूर्नामेंट नहीं खेला और 1996 में जूनियर में डेब्यू करने के बाद वह पहली बार टीम से बाहर हो गईं।

यह उनके जीवन का एक कठिन समय था। उन्होंने उन दिनों को याद करते हुए कहा, “मैं बिल्कुल भी चल नहीं पा रही थी, मैंने फिर भी खड़े होने की कोशिश की और तीर चलाए। मुझे खुद पर तरस आ रहा था।”

यही वह दौर था जब राहुल और उनके माता-पिता ने उन्हें वापस इस खेल में लौटने में अपनी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, “जब मैं अपने आप पर विश्वास नहीं कर रही थी, तो वे मुझ पर विश्वास करते थे। उनके शब्दों से मुझे बिस्तर से उठकर बाहर निकलने और नेशनल टीम में अपनी जगह बनाने के लिए लड़ने में मदद मिली।”

2012 के ओलंपिक दल का हिस्सा नहीं बनने और लगभग दो साल तक राष्ट्रीय स्तर पर बाहर रहने के बाद डोला बनर्जी ने सीनियर नेशनल्स के साथ अपनी वापसी की घोषणा की। वह स्पष्ट रूप से फील्ड पर शानदार थीं और फाइनल में उनका सामना दीपिका कुमारी से हुआ।

दोनों ने एक दूसरे से आगे निकलने के लिए शानदार प्रदर्शन किया। वह कहती हैं, "मुझे याद है कि फाइनल टाई-ब्रेकर पर चला गया था और फिर उसने 10 अंको के लिए निशाना लगाया, जबकि मैं केवल 9 अंक ही हासिल कर सकी। राहुल मेरे कोच के रूप में अपने डगआउट में बैठा था।”

उनकी यह याद उनके तीरों के जैसे ही तेज़ और धारदार थी। डोला बनर्जी ने भले ही यह खिताब नहीं जीता, लेकिन खुद को भारतीय तीरंदाजी टीम के लिए खेलने लायक साबित कर दिया था।

Rahul Banerjee (Paul Gilham/ गेटी इमेजेज द्वारा फोटो)
Rahul Banerjee (Paul Gilham/ गेटी इमेजेज द्वारा फोटो)
2012 Getty Images

ओलंपिक खेलों का अनुभव

डोला बनर्जी और राहुल बनर्जी ओलंपिक में खेलने वाले कुछ ही भारतीय भाई-बहनों में से एक हैं। हालांकि वे ओलंपिक खेलों में एक साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके। डोला 2004 और 2008 के ओलंपिक खेलों का हिस्सा रहीं, जबकि राहुल ने 2012 का ओलंपिक खेल खेला।

डोला ने कहा, “यह पहली बार था कि किसी भारतीय महिला टीम ने एथेंस 2004 में क्वालिफाई किया था। हमने वहां बहुत अच्छा प्रदर्शन तो नहीं किया। क्योंकि उस समय विश्व कप के जैसे बहुत अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन नहीं हुआ करते थे। जो इस दबाव को थोड़ा कम करने में मदद करते हैं। हम भी इस अवसर से बहुत अधिक खुश थे, यह सब बहुत ही लुभावना था।”

वह 2008 में इससे बेहतर फॉर्म में थीं। दुबई में एक साल पहले ही डोला वर्ल्ड चैंपियन बनी थीं और भारतीय महिलाओं की टीम को पदक का उम्मीदवार माना जा रहा था। लेकिन एक गलत शॉट की वजह से उनका यह अभियान पटरी से उतर गया।

उन्होंने कहा, “हम क्वार्टर फाइनल में मेज़बान चीन के खिलाफ थे। बोम्बायला (देवी) और मैं अच्छी फॉर्म में थे और युवा प्रणिता (वर्दिनी) ने सभी को प्रभावित किया था। दुर्भाग्य से हमने एक 6 अंको का निशाना लगाया, जो विरोधी टीम को जीत दिलाने के लिए पर्याप्त थी।

अपने अधिकांश करियर में राहुल बनर्जी के लिए भी हालात ऐसे ही थे, जब उन्होंने 2012 ओलंपिक में हिस्सा लिया। इसके बाद (2008-2011) तक भारतीय पुरुषों की टीम ने विश्व कप में कई पदक जीते और ओलंपिक से एक साल पहले दुनिया में नंबर-1 पर पहुंच गई थी।

2011 में विश्व कप में यूएस के ओग्डेन में एक ओलंपिक क्वालिफाइंग टूर्नामेंट में राहुल ने पाया कि उनके उपकरणों से एयरलाइन गायब था और इसलिए उन्हें अपने कुछ साथियों के बो एंड ऐरो (धनुष और बाण) को लेकर प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी।

अंत में वह लंदन 2012 के लिए अपनी जगह पक्की करने के लिए दूसरे स्थान पर रहे। इस इवेंट से एक महीने पहले ही भारतीय पुरुषों की टीम ने विश्व कप में रजत पदक जीता था, जिसकी वजह से वे पदक के लिए एक उम्मीद के तौर पर देखे जा रहे थे।

उन्होंने खुलासा करते हुए कहा, “इसपर मैंने डोला से बात की और उसने मुझे बताया कि ओलंपिक एक अलग तरह का खेल है। अलग तरह से तैयारी करनी थी और मानसिक तौर पर मजबूत होना था।”

हालांकि, लंदन पहुंचने पर महिलाओं की टीम और सहयोगी स्टाफ सहित पूरी भारतीय तीरंदाजी टीम को परेशानी हुई और सभी वायरल बुखार से पीड़ित हो गए थे। यह ‘खेलों के महाकुंभ’ में खेलने के लिए अनुकूल स्थिति नहीं थी और परिणाम भी वैसे ही सामने आए।

राहुल बनर्जी ने याद करते हुए कहा, “हमने यूके के मौसम का आकलन सही से नहीं किया था, वहां बहुत ठंड थी। कोलकाता में हम 40 डिग्री की गर्मी में प्रशिक्षण ले रहे थे और वहां की परिस्थितियां पूरी तरह से अलग थीं।”

दुर्भाग्य से दोनों भाई-बहन जीत का स्वाद नहीं चख सके और ओलंपिक पदक जीतने से चूक गए। इसके बावजूद दोनों का सफर शानदार रहा।

तीरंदाज़ी को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दे रहें बनर्जी भाई-बहन

हालांकि वे अपने सपने को पूरा नहीं कर सके। लेकिन डोला और राहुल बनर्जी दोनों ही तीरंदाजी के खेल को अपना जीवन देने के लिए आभारी हैं। उन्होंने इस खेल से प्यार किया और अब वे चाहते हैं कि युवा खिलाड़ी भी इस भावना का अनुभव करें।

यह प्रोजेक्ट डोला के अधिक करीब था, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत में काफी मुश्किलों का सामना किया था। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि राहुल इस मायने में भाग्यशाली थे कि उनके पास टाटा आर्चरी अकादमी में दी जाने वाली फंडिंग और उचित कोचिंग की सभी सुविधाएं थीं।"

उन्होंने आगे कहा, “मुझे खुद से ही सबकुछ सीखना था, मेरे पिता को ही सभी उपकरण की व्यवस्था करनी थी। हालांकि, वह वास्तव में ज्यादा खर्च नहीं कर सकते थे लेकिन फिर भी हर संभव मेरी मदद करने की कोशिश की। मुझे उसी स्कोर को शूट करने में छह साल लग गए, जो राहुल ने दो साल में ही शूट किए थे।”

इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने 2015 में ‘डोला और राहुल बनर्जी स्पोर्ट्स फ़ाउंडेशन’ शुरू किया। पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों के 32 युवा बच्चों को खोज की और उन्हें अगले बड़े भारतीय तीरंदाज बनने का प्रशिक्षण दे रहे हैं।

राहुल बनर्जी ने कहा, “2012 ओलंपिक के बाद हमें यह विचार आया, लेकिन हमारे सक्रिय करियर ने हमें ऐसा कुछ करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया। इसलिए 2015 में डोला के संन्यास लेने बाद हमने इसपर ठीक से ध्यान देने का फैसला किया।”

“हमने पहले आंध्र प्रदेश में बच्चों पर काम किया और उस अनुभव ने इसे स्थापित करने में हमारी मदद की। हम अब अगली पीढ़ी के तीरंदाज़ और भविष्य के ओलंपियन को तैयार करने की उम्मीद कर रहे हैं।”

हाल ही में पिता बने राहुल बनर्जी अभी भी टोक्यो ओलंपिक दल में जगह बनाने पर ध्यान दे रहे हैं। ऐसे में चीजें सामान्य होने के बाद अगर वह पदक जीतते हैं तो यह निश्चित रूप से दोनों के लिए एक साझा सफलता होगी।

अपने प्रेरणादायक करियर के साथ ही दोनों ही भाई-बहन डोला और राहुल बनर्जी अब अगली पीढ़ी को प्रेरित करने और उन्हें तैयार करने पर ध्यान दे रहे हैं।

ओलंपिक चैनल द्वारा!