जब Sakshi Malik ने रियो ओलिंपिक खेलों में रचा भारत के लिए पहलवानी इतिहास

रियो ओलिंपिक खेलों पर कांस्य पदक जीतने के बाद ख़ुशी मनाती हुई भारतीय पहलवान Sakshi Malik।
रियो ओलिंपिक खेलों पर कांस्य पदक जीतने के बाद ख़ुशी मनाती हुई भारतीय पहलवान Sakshi Malik।

भारत के ओलिंपिक इतिहास में व्यक्तिगत पदक जीतने वालों की सूची में कई महान खिलाड़ी शामिल हैं जिनकी कहानी खेल प्रेमियों को आज भी याद हैं। टोक्यो 2020 हर सप्ताह आपको बताएगा भारत के व्यक्तिगत पदक विजेताओं की कहानी और इस भाग में हम आपको बताएँगे कि कैसे Sakshi Malik ने रचा भारत के लिए खेल इतिहास। 

पहले की कहानी 

भारत के पहलवानी इतिहास में साल 2010 के पहले राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं ने सफलता और लोकप्रियता हासिल नहीं करि थी लेकिन Geeta Phogat के द्वारा कॉमनवेल्थ खेलों में जीते गए स्वर्ण ने सब बदल दिया। जिस वर्ष Phogat पहलवानी के शिखर की ओर बढ़ रही थी, उसी समय हरयाणा के ही रोहतक कि एक युवा पहलवान Sakshi Malik ने अंतर्राष्ट्रीय सफलता की ओर अपना पहला कदम ले चुकी थी।

रोहतक में रहने वाले एक बस कंडक्टर की बेटी Sakshi को पहलवान बनने की प्रेरणा उनके दादा Badlu Ram से मिली और उनकी प्रतिभा बचपन में ही सामने आ गयी थी। उन्होंने 12 साल की आयु में पहलवानी शुरू करि और अपने कोच Ishwar Dahiya के संरक्षण में Sakshi ने अपना खेल सफर शुरू किया।

Sakshi को अपना पहला बड़ा अंतर्राष्ट्रीय पदक 2014 कॉमनवेल्थ खेलों में मिला जब उन्होंने 58 किग्रा फ्रीस्टाइल वर्ग में रजत अपने नाम किया। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी लोकप्रियता बढ़ती रही और उन्होंने अगले साल एशियाई खेलों में कांस्य पदक अपने नाम किया। अपनी सफलता और क्षमता के बल पर भी Sakshi को 2016 रियो ओलिंपिक खेलों में आसानी से नहीं मिला और उनका न जाना लगभग तय था।

ओलिंपिक खेलों के पहले लोकप्रिय और भारत की सर्वश्रेष्ठ महिला पहलवान Geeta Phogat के ऊपर सबकी उम्मीदें टिकी हुई थी लेकिन मंगोलिया में आयोजित एक प्रतियोगिता ने सब बदल दिया। ओलिंपिक क्वालीफाइंग प्रतियोगिता के शुरुआती राउंड में हारने के बाद Geeta स्वर्ण जीतने की दौड़ से बाहर हो गयी लेकिन जब उन्होंने रेपेचाज मुकाबला खेलने से मन कर दिया तो भारतीय पहलवानी संघ ने एक बड़ा निर्णय लिया जिसने Sakshi के जीवन को बदल दिया।

तुर्की में आयोजित होने वाले ओलिंपिक क्वालीफाइंग प्रतियोगिता में Sakshi को भाग लेने का अवसर मिला और रोहतक की इस युवा पहलवान ने चीन की Zhang Lan को पराजित कर रियो 2016 में अपना स्थान पक्का कर लिया। अपना स्थान पक्का करने के बाद Sakshi ने तकनिकी अभ्यास और तैयारी पर खास ध्यान दिया।

भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी और ओलिंपिक पदक विजेता PV Sindhu से बात करते हुए Sakshi ने बताया, "रियो ओलिंपिक खेलों के पहले मैंने विदेशों में आयोजित कैंप में भाग लिया जिसके कारण मेरा अनुभव बहुत बेहतर हुआ क्योंकि मैं अभ्यास में उच्च स्तर के पहलवानों से मुकाबला कर रही थी। मैंने बहुत सारी तकनीक भी सीखी।"

आने वाले महीनों में Sakshi का जीवन और भारतीय पहलवानी का इतिहास बदलने वाला था।

कैसे जीता पदक

रियो 2016 ओलिंपिक खेलों में Sakshi ने अपना स्थान तो बना लिया था लेकिन सारे खेल प्रेमियों और विशेषज्ञों की नज़र उनकी जगह Vinesh Phogat पर थी। उन ओलिंपिक खेलों में Abhinav Bindra, Jitu Rai, Sania Mirza और Saina Nehwal जैसे खिलाड़ी भी थे और कई विशेषज्ञों ने Sakshi को पदक जीतने का दावेदार नहीं माना था।

Sakshi ने अपना पहला राउंड मुकाबला स्वीडेन की Johanna Mattsson के खिलाफ जीता और अगले मैच को जीत कर क्वार्टरफाइनल में अपनी जगह बना ली। क्वार्टरफाइनल में उनका सामना रूस की Valeria Koblova से हुआ और Sakshi को 2-9 से पराजय मिली। भाग्य ने Sakshi का साथ दिया और Koblova 58 किग्रा प्रतियोगिता के फाइनल में पहुँच गयी जिसके कारण उन्हें रेपेचाज राउंड में प्रवेश मिला और उसके साथ पदक जीतने का अवसर।

एक बार पदक जीतने का मौका खो चुकी Sakshi ने इस बार ठान लिया था कि वह भारत के लिए ओलिंपिक जीतने वाली पहली महिला पहलवान बनेंगी। पहला मुकाबला जीतने के बाद ओलिंपिक कांस्य पदक के लिए Sakshi का मुकाबला किर्ग़िज़स्तान की Aisuluu Tynybekova से हुआ। पदक मुकाबले में Sakshi की शुरुआत काफी ख़राब रही और वह 0-5 से पीछे हो गयी और हार की कगार पर थी।

उस मुकाबले को याद करते हुए Sakshi ने कहा, "हाँ, मैं 0-5 से पीछे ज़रूर थी लेकिन मुझे लगा कि बहुत समय बचा था और मैं वापसी कर सकती हूँ। अगर मैं उस अवसर को जाने देती तो मुझे चार साल और रुकना पड़ता।"

रक्षात्मक रणनीति अपनाने वाली Sakshi ने अपना खेल बदला और आक्रमण करना शुरू किया जिसके कारण पूरा मुकाबला बदल गया। पांच अंक पीछे चल रही Sakshi ने वापसी करते हुए कांस्य पदक मुकाबला 8-5 से जीत लिया और वह कर दिखाया जो किसी भी महिला पहलवान ने नहीं किया था। Sushil Kumar और Yogeshwar Dutt के बाद पहलवानी में भारत के लिए ओलिंपिक पदक जीतने वाली तीसरी पहलवान बनी।

पदक जीतने के बाद Sakshi ने भारत का ध्वज अपने कन्धों पर रखा और उस प्रतियोगिता स्थल का चक्कर लगाया। उनकी आँखों में आँसू के साथ पदक जीतने की ख़ुशी भी थी और इस क्षण ने महिलाओं के लिए भारतीय महिलाओं का ओलिंपिक इतिहास बदल दिया।

आगे की कहानी

Sakshi की रियो ओलिंपिक खेलों में जीत के बाद उन्होंने अगले कुछ सालों में अपना बेहतरीन प्रदर्शन बरक़रार रखा। नई दिल्ली में आयोजित हुए 2017 एशियाई खेलों में Sakshi ने रजत जीता और उसी साल कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में स्वर्ण जीता। गोल्ड कोस्ट 2018 कॉमनवेल्थ खेलों में Sakshi ने 60 किग्रा वर्ग में कांस्य पदक जीता।

हरयाणा की इस पहलवान को किसी ने भी ओलिंपिक पदक जीतने का दावेदार नहीं माना था लेकिन Sakshi ने वह कर दिखाया जो किसी और ने नहीं किया है। Sakshi को 2017 में पद्मश्री पुरुस्कार से सम्मानित किया गया और उन्होंने कई युवा पहलवानों को प्रेरित किया है।

टोक्यो 2020 ओलिंपिक खेलों में Sakshi ने अपना स्थान पक्का नहीं किया है और वह आने वाले महीनों में आशा करेंगी कि उन्हें दोबारा पदक जीतने का मौका मिलेगा।