भारतीय महिला हॉकी टीम की गोलकीपर Savita Punia ने सफलता का श्रेय परिवार को दिया

भारत की Savita Punia न्यू ज़ीलैण्ड के खिलाफ गोल का बचाव करती हुई।
भारत की Savita Punia न्यू ज़ीलैण्ड के खिलाफ गोल का बचाव करती हुई।

दादा जी ने जगाया हॉकी का प्रेम और उसके बाद बस भारतीय हॉकी की उपकप्तान सविता पूनिया सफलता के शिखर पर चढ़ती गईं।

Savita Punia एक शर्मीली और शांत किस्म की बच्ची थीं और उनके इस स्वभाव को देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह अपने जीवन में खेल या स्पोर्ट्स को करियर बना सकती हैं।

एक सफ़र जिसने एक शांत रहनी वाली बच्ची को भारतीय वुमेंस हॉकी टीम का उपकप्तान बना दिया और आज वह भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में जानी जाती हैं। उपकप्तान बनने से यह साबित होता है कि मंच छोटा हो या बड़ा उन्होंने हमेशा सुर्खियाँ बटोरी हैं और अपनी गोलकीपिंग तकनीकों से से सभी का मन मोह लिया।

सविता पूनिया आज भी अपनी सफलता का श्रेय अपने परिवार और ख़ास तौर से अपने दादा जी Ranjeet Punia को देती हैं और उनके प्रोत्साहन की हमेशा कद्र करती हैं।

ओलंपिक चैनल से बात करते हुए उन्होंने कहा “मैं आज जो कुछ भी हूं अपने दादा जी की वजह से हूं। उनके प्यार ने ही मुझे हॉकी खेलने के लिए प्रोत्साहित किया और वह हमेशा प्रेरणा बनकर मेरे साथ खड़े रहे।”

भारत की गोलकीपर Savita Punia कनाडा के खिलाफ गोल रोकती हुई।
भारत की गोलकीपर Savita Punia कनाडा के खिलाफ गोल रोकती हुई।
2014 Getty Images

“मुझे याद है जब मैं पहली बार स्टेट खेलने के लिए चुनी गई थी तब उनकी आँखों में आंसू आ गए थे। वह मेरी तरक़्क़ी देख कर बहुत ख़ुश थे।”

असल मायनों में Savita का हॉकी करियर आसान नहीं रहा है और समय-समय पर उन्होंने बड़ी से बड़ी चुनौतियों को मात देकर अपने कारवां को आगे बढ़ाया है।

हरियाणा की रहने वाली Savita Punia के गाँव में लड़कियों को खेलने कूदने और स्पोर्ट्स को करियर बनाने के लिए सक्षम नहीं समझा जाता था और सभी का मानना था कि लड़कियों की असली जगह घर के अंदर है। इतना ही नहीं जब सविता ने हॉकी खेलना शुरू ही किया था तब उनकी माँ को अर्थराइटिस की बीमारी ने बिस्तर पर लेटा दिया था और वह भी सविता के लिए एक कड़ी चुनौती बन गई थी।

Savita Punia ने आगे अलफ़ाज़ साझा करते हुए कहा “मेरे दादा जी कभी स्कूल नहीं गए लेकिन वह बहुत खुले दिमाग के व्यक्ति थे। चाहे कोई भी मुसीबत आ जाए लेकिन उन्होंने मुझे हमेशा हॉकी खेलने के लिए बढ़ावा दिया।”

“यहां तक कि जब मेरी माँ की तबीयत ठीक नहीं थी तब भी मेरे परिवार ने मुझे आगे बढ़ने का अवसर दिया। उन्हें पता था कि ऐसे में मैं अपने सपने की ओर नहीं बढ़ पाऊंगी इसलिए वह हमेशा मेरे साथ खड़े रहे। यही वजह है कि मेरे दादा जी और मेरे माँ बाप मेरे सबसे बड़े रोल मॉडल हैं।”

Savita Punia ने भारतीय हॉकी टीम के लिए अपना डेब्यू 2008 में किया था और तब से ले कर कई सालों तक वह अपनी जगह नहीं बना सकी थी और उन्होंने बहुत सा समय बेंच पर बैठ कर बिताया था।

उस समय भी उनके परिवार के गर्व ने उन्हें हिम्मत और आगे बढ़ने की शक्ति दी। इसके बाद साल 2013 में सविता ने अच्छा प्रदर्शन दिखाते हुए सुर्ख़ियाँ बटोरी और रियो गेम्स 2016 में उन्होंने काफी अच्छा प्रदर्शन भी किया।

रियो का सफ़र भारतीय महिला हॉकी टीम के लिए बहुत अच्छा तो नहीं रहा लेकिन पिछले कुछ सालों में उनके प्रदर्शन ने टोक्यो 2020 के लिए नई उम्मीदें दे दी हैं और माना जा रहा है कि महिला टीम पहली बार मेडल भी जीत सकती हैा ने भारतीय हॉकी टीम के लिए अपना डेब्यू 2008 में किया था और तब से ले कर कई सालों तक वह अपनी जगह नहीं बना सकी थी और उन्होंने बहुत सा समय बेंच पर बैठ कर बिताया था।

ओलिंपिक चैनल द्वारा !