Abebe Bikila: वो एथलीट जिसने एपेन्डिसाइटिस सर्जरी के 40 दिन बाद मैराथन गोल्ड जीतता है!!

इथियोपिया के Abebe Bikila ने 21 अक्टूबर 1964 को नेशनल स्टेडियम में ओलंपिक खेलों के दौरान पुरुषों की मैराथन दौड़ जीती। (Keystone/Hulton Archive/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)
इथियोपिया के Abebe Bikila ने 21 अक्टूबर 1964 को नेशनल स्टेडियम में ओलंपिक खेलों के दौरान पुरुषों की मैराथन दौड़ जीती। (Keystone/Hulton Archive/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)

अक्टूबर 1964 में, टोक्यो ने अपने पहले ओलंपिक खेलों की मेजबानी की थी। उन ऐतिहासिक पलों को याद करते हुए टोक्यो 2020 आपको कुछ सबसे अविश्वसनीय और जिंदादिल इवेंट्स से रूबरू कराएगा, जो आज से 56 साल पहले हुई थी। श्रृंखला के नवीनतम भाग में, हम इथियोपिया के मैराथन धावक Abebe Bikila पर एक नज़र डालते हैं, जिसने ओलंपिक स्वर्ण का दावा करने के लिए बहुत संघर्ष किया।

बैकग्राउंड

इथियोपिया के बाहर किसी ने भी Abebe Bikila के बारे में नहीं सुना था, जब वह रोम 1960 ओलंपिक खेलों में पहुंचे थे। वह अपने देश के लिए पहली पसंद भी नहीं थे, शायद इसलिए कि, उस समय तक उन्होंने ओलंपिक स्वर्ण पदक नहीं जीता था।

वास्तव में, 1960 तक, एक पूर्वी अफ्रीकी राष्ट्र के किसी भी एथलीट ने स्वर्ण नहीं जीता था - और ऐसा नहीं लगता था कि Bikila, जो इथियोपिया की सेना में एक सैनिक था और एक घायल टीम के साथी के लिए अंतिम क्षणों में प्रतिस्थापन करने वाला व्यक्ति था, इथियोपिया की किस्मत को पलट कर रख देगा।

"यह इथियोपिया का एथलीट कौन है?" एक टिप्पणीकार ने सवाल किया।

बहुत ही जल्द उसके पास इस बात का जवाब होगा।

Bikila ने उस साल रोम में मैराथन के लिए नए रनिंग शूज़ खरीदे थे, लेकिन उन्हें पहनने के बाद उनके पैरों में छाले पड़ गए, बावजूद इसके उसने दौड़ने का फैसला किया - क्योंकि उसने कई बार इस तरह की दौड़ अपने घर के पास के मैदानों में की थी - वह इटली की राजधानी में 26.2 मील के कोर्स में नंगे पैर दौड़ने के लिए प्रसिद्ध थे, एक ऐसा धावक जो सड़कों पर अपने घाव के निशान छोड़ जाता है। लेकिन मैराथन कोर्स एक एथलेटिक्स ट्रैक या यहां तक ​​कि एक क्रॉस कंट्री दौड़ की गद्दीदार पृथ्वी के नरम जमीन की तरह कुछ भी नहीं था। मैराथन धावक जिन सड़कों से गुजरेंगे, उनमें से कई पथरीली और असमान होंगी। और इस तरह रात में दौड़ शुरू हुई - इटली के सशस्त्र बलों के सदस्यों सड़कों के किनारे मशालें जलाकर खड़े थे।

"यह मैराथन नहीं था, यह 'Aida' था," इटली के Corrieredella Sera ने बताया।" रोम के लोग सड़कों के किनारे शोर मचा रहे थे।"

लेकिन पूरी दुनिया को चौंकाते हुए, Bikila ने उस शाम को रोम की सड़कों पर अपनी शानदार प्रदर्शन के साथ 2:15:16 के रिकॉर्ड समय में दौड़ पूरी की और पूरे आठ सेकंड के विश्व रिकॉर्ड को तोड़ दिया।

टोक्यो में चार साल बाद, क्या वह ऐसा कुछ कर पाएंगे जिससे वह बैक-टू-बैक मैराथन स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले एथलीट बन सकें?

टोक्यो 1964: मैराथन

जीत के क्षण

जब टोक्यो 1964 शुरू होने वाला था, उस समय चल रही दुनिया में Bikila किसी परिचय का मोहताज नहीं था। वह अब स्वर्ण पदक हासिल करने वाला पसंदीदा धावक था, लेकिन टोक्यो 1964 इथियोपिया के इस ‘लंबी दूरी के राजा के लिए’ काफी अलग अनुभव होगा।

इस समय, टोक्यो में मौसम काफी बिगड़ा हुआ नजर आ रहा था, 90 फीसदी आर्द्रता के कारण स्टेडियम में लगभग धुंध छाई हुई थी, जहां शुरुआत में मैराथन के सबसे बड़े दिग्गज की तलाश शुरू करने के लिए लाइन लगी थी।

कुछ ऐसा भी था, जो कि रोम में उसकी दौड़ को देखने वाले किसी भी व्यक्ति ने नोट किया होगा, वह यह था कि Bikila ने सफेद, सपाट-तल वाले चलने वाले जूते पहने हुए थे - जो आज लंबी दूरी के कुलीन धावकों द्वारा पहने जाने वाले अल्ट्रा-कुशनर गियर से निश्चित रूप से अलग दिखते हैं। तो उसके जूते बड़े सामान्य से थे जो कि किसी धावक के जूतों जैसे तो बिल्कुल नहीं थे।

लेकिन शायद Bikila के लिए शायद यह सब उतना मायने नहीं रखता था, उसे सिर्फ और सिर्फ परिणाम से मतलब था। मैराथन प्रतियोगिता से सिर्फ 40 दिन पहले, उन्हें तीव्र एपेंडिसाइटिस का पता चला था, एक आपातकालीन एपेंडेक्टोमी के बाद उन्होंने अस्पताल में एक सप्ताह बिताया।

लेकिन यह सब छोटी-छोटी बातें उस साल Bikila को टोक्यो1964 में इतिहास बनाने से नहीं रोक सकतीं।

इस भीषण दौड़ में, भाग लेने वाले कई धावकों (68 स्टार्टर्स, 10 इसकी फिनिश लाइन तक भी नहीं पहुंचे) के लिए यह दौड़ आसान नहीं थी, पथरीली सड़क पर जो कि उबड़ खाबड़ भी थी, एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की दौड़ को अंजाम देना काफी मुश्किलों भरा रहा। लेकिन Bikila एक अपवाद थे।

अपने आराम से, अत्यधिक कुशल चलने वाली शैली का उपयोग करते हुए, इथियोपियाई ने टोक्यो की सड़कों पर नज़र रखी।

सच में, वह उस दिन अपनी खुद की एक लीग में थे, उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी, ग्रेट ब्रिटेन के Basil Heatley की तुलना में चार मिनट पहले ही इस दौड़ को पूरा कर लिया।

जब वह दौड़ के अंत में टेप के माध्यम से 2: 12: 11.2 के एक नए ओलंपिक रिकॉर्ड बनाते हुए निकले, तो उन्होंने देखने से ऐसा बिल्कुल भी नहीं लग रहा था कि उन्होंने बहुत कड़ी मेहनत की हो, ऐसा लग रहा था जैसे यह उनके बाएं हाथ का खेल हो। एक ऐसी कठिन दौड़ जिसमें कई धावक फिनिश लाइन से काफी पहले दम तोड़ चुके हो, Bikila के लिए यह रोजमर्रा के अभ्यास जैसी ही दिखी जिसमें वह ट्रैक के किनारे अपनी पीठ का जिमनास्टिक अभ्यास कर रहे थे।

कई खेलों में दूसरी बार, Bikila ने इथियोपिया का पहला और एक मात्र स्वर्ण पदक प्राप्त किया - और इसके साथ ही वह दो मैराथन स्वर्ण पदक जीतने वाले एकमात्र एथलीट बन गए।

इथियोपिया के Abebe Bikila 21 अक्टूबर 1964 को टोक्यो ओलंपिक खेलों के दौरान पुरुषों की मैराथन दौड़ जीतने के बाद प्रतिक्रिया करते हुए। (Keystone/Hulton Archive/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)
इथियोपिया के Abebe Bikila 21 अक्टूबर 1964 को टोक्यो ओलंपिक खेलों के दौरान पुरुषों की मैराथन दौड़ जीतने के बाद प्रतिक्रिया करते हुए। (Keystone/Hulton Archive/ गेटी इमेज द्वारा फोटो)
2019 Getty Images

भविष्य के गर्त में...

Abebe Bikila ने जिन 13 मैराथन में मुकाबला किया, उनमें से 12 पर उनकी जीत दर्ज हुई।

उन्होंने जब पहली बार ओलंपिक मंच पर अपने देश का गौरव बढ़ाया, तब तक पूर्वी अफ्रीकी एथलीट्स ने कभी भी ओलंपिक स्वर्ण नहीं जीता था। अब इस क्षेत्र के धावक लंबी दूरी की दौड़ में सबसे आगे हैं, जिसमें इथियोपिया अपने दम पर कुल 22 स्वर्ण पदक जीत चुका है।

Bikila एक नायक के रूप में घर लौटे, लेकिन 1969 में उनके जीवन में एक भयंकर त्रासदी हुई जिसने उनका जीवन पलट कर रख दिया। वह वोक्सवैगन बीटल चला रहे थे जो अचानक एक यातायात दुर्घटना का शिकार हो गई। इस दुर्घटना में महान एथलीट Bikila लकवे के शिकार हो गए। वह अब फिर कभी नहीं चल पाएंगे।

लेकिन व्हीलचेयर से बंधे रहने के बावजूद, Bikila को प्रतिस्पर्धा जारी रखने से कोई नहीं रोक पाया। एक साल बाद, अभी भी अपने दुर्घटना के लिए उपचार प्राप्त करते हुए, उन्होंने लंदन में 1970 स्टोक मैंडेविले खेलों में भाग लिया - इस तरह वह आज के पैरालम्पिक खेलों के अग्रदूत बने।

अपने दुर्घटना से संबंधित मस्तिष्क रक्तस्राव के बाद, 1973 में 41 साल की उम्र में Bikila की मृत्यु हो गई। टोक्यो में उनकी अविश्वसनीय जीत के 10 सालों के अंदर ही यह महान खिलाड़ी हमें अलविदा कह चला।

लेकिन पूर्वी अफ्रीका के पहले ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता की विरासत आज भी हमारे दिलों में ज़िंदा है।